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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

विवाहप्रकरणम् १७९ इन दोनों मन्त्रों को बोले। पश्चात् वधू और वर दोनों यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख होके कुण्ड के समीप बैठें और पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों से एक-एक से एक-एक आचमन करके तीन-तीन आचमन दोनों करें। पश्चात् पृष्ठ २३ में लिखी हुई समिधाओं से यज्ञकुण्ड में अग्नि को प्रदीप्त करके, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे घृत और स्थालीपाक, अर्थात् भात को उसी समय बनावें। पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाण (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि चार मन्त्रों से समिधा-होम दोनों जने करके, पश्चात् पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे आधारावाज्यभागाहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार, दोनों मिलके आठ आज्याहुति वर-वधू देवें। तत्पश्चात् जो ऊपर सिद्ध किया हुआ ओदन, अर्थात् भात है, उसे एक पात्र में निकालके उसके ऊपर स्रुवा से घृत सेचन करके, घृत और भात को अच्छे प्रकार मिलाकर दक्षिण हाथ से थोड़ा-थोड़ा भात दोनों जने लेके— ओम् अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः—इदन्न मम ॥ ओम् अनुमतये स्वाहा ॥ इदमनुमतये—इदन्नमम ॥ इनमें से प्रत्येक मन्त्र से एक-एक करके चार स्थालीपाक, अर्थात् भात की आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो०) इस मन्त्र से एक स्विष्टकृत् आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, दोनों मिलके