संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० संस्कारविधिः बारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् शेष रहा हुआ भात एक पात्र में निकालके उसपर घृत-सेचन और दक्षिण हाथ रखके— ओम् अन्नपाशेन मणिना प्राणसूत्रेण पृश्निना। बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते१ ॥१॥ ओम् यदेतद्धृदयं तव तदस्तु हृदयं मम। यदिदँ हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव२ ॥२॥ ओम् अन्नं प्राणस्य षङ्गिँशस्तेन बध्नामि त्वा असौ३ ॥३॥ इन तीनों मन्त्रों को मन से जपके वर उस भात में से प्रथम थोड़ा-सा भक्षण करके, जो उच्छिष्ट=शेष भात रहे वह अपनी वधू के लिए खाने को देवे और जब वधू उसे खा चुके, तब वधू-वर यज्ञमण्डप में सन्नद्ध हुए शुभासन पर नियम प्रमाणे पूर्वाभिमुख बैठें और पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेदोक्त १. हे वधू वा वर! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न तथा अन्न और प्राण का अन्तरिक्ष के साथ सम्बन्ध है, वैसे (ते) तेरे (हृदयम्) हृदय (च) और (मनः) मन (च) और चित्त आदि को (सत्यग्रन्थिना) सत्यता की गाँठ से (बध्नामि) बाँधती वा बाँधता हूँ॥१॥ २. हे वर! हे स्वामिन् वा हे पत्नी! (यदेतत्) जो यह (तव) तेरा (हृदयम्) आत्मा वा अन्तःकरण है (तत्) वह (मम) मेरा (हृदयम्) आत्मा अन्तःकरण के तुल्य प्रिय (अस्तु) हो, और (मम) मेरा (यदिदम्) जो यह (हृदयम्) आत्मा, प्राण और मन है (तत्) सो (तव) तेरे (हृदयम्) आत्मादि के तुल्य प्रिय (अस्तु) सदा रहे॥२॥ ३. (असौ) हे यशोदे! जो (प्राणस्य) प्राण का पोषण करनेहारा (षड्विंशः) छब्बीसवाँ तत्त्व (अन्नम्) अन्न है (तेन) उससे (त्वा) तुझको (बध्नामि) दृढ़ प्रीति से बाँधता वा बाँधती हूँ॥३॥