संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १८१ महावामदेव्यगान करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ९-२१ में लिखे प्रमाणे ईश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण कर्म करके क्षार- लवणरहित मिष्ट, दुग्ध, घृतादिसहित भोजन करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३६, ३७ में लिखे प्रमाणे पुरोहितादि सद्धर्मी और कार्यार्थ इकट्ठे हुए लोगों को सन्मानार्थ उत्तम भोजन कराना। तत्पश्चात् पुरुषों का पुरुष और स्त्रियों का स्त्री यथायोग्य आदर-सत्कार करके उन्हें विदा कर देवें। तत्पश्चात् दश घटिका रात्रि जाए, तब वधू और वर पृथक्- पृथक् स्थान में भूमि में बिछौना करके तीन रात्रिपर्यन्त ब्रह्मचर्य- व्रतसहित रहकर शयन करें और ऐसा भोजन करें कि स्वप्न में भी वीर्यपात न होवे। तत्पश्चात् चौथे दिवस विधिपूर्वक गर्भाधानसंस्कार करें। यदि चौथे दिवस कोई अड़चन आवे तो अधिक दिन ब्रह्मचर्यव्रत में दृढ़ रहकर जिस दिन दोनों की इच्छा हो और पृष्ठ ४१-४२ में लिखे प्रमाणे गर्भाधान की रात्रि भी हो, उस रात्रि में यथाविधि गर्भाधान करें। तत्पश्चात् दूसरे वा तीसरे दिन प्रातःकाल वर पक्षवाले लोग वधू और वर को रथ में बैठाके बड़े सन्मान से अपने घर में लावें और जो वधू अपने माता-पिता के घर को छोड़ते समय आँख में अश्रु भर लावे तो— जी॒वं रु॑दन्ति॒ वि म॑यन्ते अध्व॒रे दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं दीधियुर्नर॑: । वा॒मं पि॒तृभ्यो॒ य इदं समे॑रि॒रे मय॑: पति॑भ्यो॒ जन॑यः परि॒ष्वजे॑ ॥ इस मन्त्र को वर बोले और रथ में बैठते समय वर अपने साथ दक्षिण बाजू वधू को बैठावे। उस समय वर— पू॒षा त्वे॒तो न॑यतु॒ हस्त॒गृह्या॒श्विना॑ त्वा॒ प्र व॑हतां॒ रथे॑न । गृ॒हान्ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॑मा व॑दासि ॥ १ ॥