भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 186

१८२ संस्कारविधिः सु॒किं॒शुकं॑ शल्म॒लिं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं॒ सु॒वृतं॑ सु॒च॒क्रम॑। आ रो॑ह सूर्ये अ॒मृत॑स्य लो॒कं स्योनं॒ पत्ये॑ वह॒तुं कृ॑णुष्व॥२॥ इन दो मन्त्रों को बोलके रथ को चलावे। यदि वधू को वहाँ से अपने घर लाने के समय नौका पर बैठना पड़े तो इस निम्नलिखित मन्त्र को पूर्व बोलके नौका पर बैठें— अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत् प्र त॑रता सखायः। और नाव से उतरते समय— अत्रा॑ जहाम॒ ये अस॒न्नशे॑वाः शिवा॒न्व्यय॒मुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न्॥ इस उत्तरार्द्ध मन्त्र को बोलके नाव से उतरें। पुनः इसी प्रकार मार्ग में चार मार्गों का संयोग, नदी, व्याघ्र, चोर आदि से भय या भयङ्कर स्थान, ऊँचे-नीचे खाढ़ावाली पृथिवी, बड़े-बड़े वृक्षों का झुण्ड या श्मशानभूमि आवे तो— मा वि॑दन् परिप॒न्थिनो॒ य आ॒सीद॑न्ति दम्पती। सु॒गेभि॑र्दुर्गमती॒तामप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर जिस रथ में बैठके जाते हों, उस रथ का कोई अङ्ग टूट जाए, अथवा किसी प्रकार का अकस्मात् उपद्रव होवे, तो मार्ग में कोई अच्छा स्थान देखके निवास करना और साथ रक्खे हुए विवाहाग्नि को प्रगट करके उसमें पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे चार व्याहृति आज्याहुति देनी। पश्चात् पृष्ठ ३६- ३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करना। पश्चात् जब वधू-वर का रथ वर के घर के आगे आ पहुँचे, तब कुलीन, पुत्रवती, सौभाग्यवती, या कोई ब्राह्मणी,