संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १८३ या अपने कुल की स्त्री आगे-सामने आकर वधू का हाथ पकड़के वर के साथ रथ से नीचे उतारे और वर के साथ सभामण्डप में ले-जावे। सभामण्डप द्वारे आते ही वर वहाँ कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर अवलोकन करके— सु॒म॒ङ्ग॒लीरियं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त । सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वायाऽथास्तं॒ वि प॑रतैन ॥ इस मन्त्र को बोले। और आये हुए लोग— ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु॥ इस प्रकार आशीर्वाद देवें। तत्पश्चात् वर— इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन् गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृ॒हि । एना॒ पत्या॑ त॒न्वं१॒॑ सं सृ॑जस्वाऽधा॒ जिब्री॑ वि॒दथ॒मा व॑दाथः ॥ इस मन्त्र को बोलके वधू को सभामण्डप में ले-जावे। तत्पश्चात् वधू-वर पूर्व-स्थापित यज्ञकुण्ड के समीप जावें। उस समय वर— ओम् इ॒ह गावः॑ प्रजा॑यध्वम॒मिहाश्वा॑ इ॒ह पूरू॑षाः । इ॒हो स॒हस्र॑दक्षिणोऽपि॑ ए॒षा नि षी॑दतु ॥ इस मन्त्र को बोलके यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पीठासन अथवा तृणासन पर वधू को अपने दक्षिण भाग में पूर्वाभिमुख बैठावे। तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोप- स्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों से एक-एक से एक- एक करके तीन-तीन आचमन करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे कुण्ड में यथाविधि समिधाचयन, अग्न्याधान करें। जब उस कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित हो, तब उसपर घृत सिद्ध करके