संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ संस्कारविधिः पृष्ठ ३३-३४ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, अष्टाज्याहुति आठ, सब मिलके सोलह आज्याहुति वधू-वर करके प्रधानहोम का प्रारम्भ निम्नलिखित मन्त्रों से करें— ओम् इह धृतिः स्वाहा॥ इदमीह धृत्यै—इदन्न मम॥ ओम् इह स्वधृतिः स्वाहा॥ इदमीह स्वधृत्यै—इदन्न मम॥ ओम् इह रन्तिः स्वाहा॥ इदमीह रन्त्यै—इदन्न मम॥ ओम् इह रमस्व स्वाहा॥ इदमीह रमाय—इदन्न मम॥ ओं मयि धृतिः स्वाहा॥ इदं मयि धृत्यै—इदन्न मम॥ ओं मयि स्वधृतिः स्वाहा॥ इदं मयि स्वधृत्यै—इदन्न मम॥ ओं मयि रमः स्वाहा॥ इदं मयि रमाय—इदन्न मम॥ ओं मयि रमस्व स्वाहा॥ इदं मयि रमाय—इदन्न मम॥ इन प्रत्येक मन्त्र से एक-एक करके आठ आज्याहुति देके— ओम् आ न॑ः प्र॒जां ज॑नयतु प्र॒जाप॑तिराजर॒साय॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा। अदु॑र्मङ्गलीः पतिलोकमा वि॑श॒ शं नौ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑*॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै— इदन्न मम॥ १॥
- हे वधू (अर्यमा) न्यायकारी, दयालु (प्रजापतिः) परमात्मा कृपा करके (आजरसाय) जरावस्था पर्यन्त जीने के लिए (नः) हमारी (प्रजाम्) उत्तम प्रजा को शुभ गुण, कर्म और स्वभाव से (आजनयतु) प्रसिद्ध करे, (समनक्तु) उससे उत्तम सुख को प्राप्त करे, और वे शुभगुणयुक्त (मङ्गलीः) स्त्रीलोग सब कुटुम्बियों को आनन्द (अदुः) देवें, उनमें से एक तू हे वरानने ! (पतिलोकम्) पति के घर वा सुख को (आविश) प्रवेश वा प्राप्त हो (नः) हमारे (द्विपदे) पिता आदि मनुष्यों के लिए (शम्) सुखकारिणी और (चतुष्पदे) गौ आदि को (शम्) सुखकर्त्री (भव) हो॥ १॥