भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

अथ गृहाश्रमसंस्कारविधिं वक्ष्यामः 'गृहाश्रम-संस्कार' उसे कहते हैं कि जो ऐहिक और पारलौकिक सुख-प्राप्ति के लिए विवाह करके अपने सामर्थ्य के अनुसार परोपकार करना और नियत काल में यथाविधि ईश्वर-उपासना एवं गृहकृत्य करना और सत्य धर्म में ही अपना तन-मन-धन लगाना तथा धर्मानुसार सन्तानों की उत्पत्ति करना। अत्र प्रमाणानि सोमो॑ वधू॒युर॑भवद॒श्विना॑स्तामु॒भा व॒रा। सूर्या॒ यत्पत्ये॒ शंस॑न्तीं मन॑सा सवि॒ताद॑दात्॥ १॥ इ॒हैव स्तं॒ मा वि यौ॑ष्टं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतम्। क्रीड॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्व॒स्त्यौ॑॥ २॥ अर्थ—(सोमः) सुकुमार, शुभगुणयुक्त, (वधूयुः) वधू की कामना करनेवाला पति तथा पति की कामना करनेवाली वधू (अश्विना) दोनों ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त (अभवत्) होवें और (उभा) दोनों (वरा) श्रेष्ठ, तुल्य गुण-कर्म-स्वभाववाले (आस्ताम्) होवें। ऐसी (यत्) जो (सूर्याम्) सूर्य की किरणवत्, सौन्दर्य गुणयुक्त, (पत्ये) पति के लिए (मनसा) मन से (शंसन्तीम्) गुण-कीर्त्तन करनेवाली वधू है, उसको पुरुष और इसी प्रकार के पुरुष को स्त्री (सविता) सकल जगत् का उत्पादक परमात्मा (ददात्) देता है, अर्थात् बड़े भाग्य से दोनों स्त्री-पुरुषों का, जोकि तुल्य गुण-कर्म-स्वभाव हों, जोड़ा मिलता है॥ १॥ हे स्त्री और पुरुष ! मैं परमेश्वर आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे लिए विवाह में जो पूर्व प्रतिज्ञा हो चुकी है, जिसे तुम दोनों