भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

१९० संस्कारविधिः ने स्वीकार किया है, (इहैव) इसी में (स्तम्) तत्पर रहो, (मा वियौष्टम्) इस प्रतिज्ञा से वियुक्त मत होओ। (विश्वमायुर्व्यश्नुतम्) ऋतुगामी होके वीर्य का अधिक नाश न करके सम्पूर्ण आयु, जो सौ वर्षों से कम नहीं है, उसे प्राप्त होओ और पूर्वोक्त धर्मरीति से (पुत्रैः) पुत्रों और (नप्तृभिः) नातियों के साथ (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते हुए (स्वस्तकौ) उत्तम गृहवाले (मोदमानौ) आनन्दित होकर गृहाश्रम में प्रीतिपूर्वक वास करो ॥ २ ॥ सुम॒ङ्गली प्र॒तर॑णी गृ॒हाणां॑ सु॒शेवा॒ पत्ये॑ श्वशु॑राय॒ शंभूः॑ । स्यो॒ना श्व॒श्र्वै प्र गृ॒हान् वि॒शेमान् ॥ ३ ॥ स्यो॒ना भ॑व॒ श्वशु॑रेभ्यः स्यो॒ना पत्ये॑ गृ॒हेभ्यः॑ । स्यो॒नास्यै सर्व॑स्यै वि॒शे स्यो॒ना पु॒ष्टायै॑षां भव ॥ ४ ॥ या दु॒र्हार्दो॑ यु॒वत॑यो याश्चे॒ह ज॒रती॑रपि॑ । वर्चो॒ न्व१॑स्यै सं द॒त्ताथास्तं॑ वि॒परै॑तन ॥ ५ ॥ आ रो॑ह॒ तल्पं॑ सुम॒न॒स्यमा॑ने॒ह प्र॒जां ज॑नय॒ पत्ये॑ अ॒स्मै । इ॒न्द्रा॒णीव॑ सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना॒ ज्योति॑रग्रा उ॒षसः॒ प्रति॑ जागरासि ॥ ६ ॥ अर्थ—हे वरानने ! तू (सुमङ्गली) अच्छे मङ्गलाचरण करने तथा (प्रतरणी) दोष और शोकादि से पृथक् रहनेवाली, (गृहाणाम्) गृह-कार्यों में चतुर और तत्पर रहकर (सुशेवा) उत्तम सुखयुक्त होके (पत्ये) पति (श्वशुराय) श्वशुर और (श्वश्र्वै) सासु के लिए (शम्भूः) सुखकर्त्री और (स्योना) स्वयं प्रसन्न हुई (इमान्) इन (गृहान्) घरों में सुकपूर्वक (प्रविश) प्रवेश कर ॥ ३ ॥ हे वधू ! तू (श्वशुरेभ्यः) श्वशुरादि के लिए (स्योना) सुखदाता, (पत्ये) पति के लिए (स्योना) सुखदाता, (गृहेभ्यः)