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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

संन्यासप्रकरणम् २६५ होवे और जिसको दृढ़ निश्चय हो जावे कि मैं मरण-पर्यन्त यथावत् संन्यास-धर्म का निर्वाह कर सकूँगा तो वह न गृहाश्रम करे न वानप्रस्थाश्रम, किन्तु ब्रह्मचर्याश्रम को पूर्ण करके संन्यासाश्रम को ग्रहण कर लेवे। अत्र वेदप्रमाणानि श॒र्य॒णाव॑ति॒ सोम॒मिन्द्र॑: पिबतु वृत्र॒हा। बलं॒ दधा॑न आ॒त्मनि॑ क॒रिष्यन् वी॒र्य॑ महद् इन्द्रा॑ये॒न्दो परि॑ स्रव ॥ १ ॥ आ प॑वस्व दिशां पत आ॒र्जीकात् सोम॑ मीढ्वः। ऋ॒तवा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्र॒द्धया॑ तप॑सा सु॒त इन्द्रा॑येन्दो परि॑ स्रव ॥ २ ॥ अर्थ—मैं ईश्वर संन्यास लेनेवाले तुझ मनुष्य को उपदेश करता हूँ कि जैसे (वृत्रहा) मेघ का नाश करनेवाला (इन्द्रः) सूर्य (शर्यणावति) हिंसनीय पदार्थों से युक्त भूमितल में स्थित (सोमम्) रस को पीता है, वैसे संन्यास लेनेवाला पुरुष उत्तम मूल, फलों के रस को (पिबतु) पीवे और (आत्मनि) अपने आत्मा में (महत्) बड़े (वीर्यम्) सामर्थ्य को (करिष्यन्) करूँगा, ऐसी इच्छा करता हुआ (बलं दधानः) दिव्य बल को धारण करता हुआ (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए, हे (इन्दो) चन्द्रमा के तुल्य सबको आनन्दित करनेहारे पूर्ण विद्वन्! तू संन्यास लेके सबपर (परि स्रव) सत्योपदेश की वृष्टि कर ॥ १ ॥ हे (सोम) सौम्यगुणसम्पन्न (मीढ्वः) सत्य से सबके अन्तःकरण को सींचनेवाले, (दिशां पते) सब दिशाओं में स्थित मनुष्यों को सच्चा ज्ञान देके पालन करनेवाले, (इन्दो) शमादिगुणयुक्त संन्यासिन्! तू (ऋतवाकेन) यथार्थ बोलने, (सत्येन) सत्यभाषण करने से (श्रद्धया) सत्य के धारण में सच्ची प्रीति और (तपसा) प्राणायाम, योगाभ्यास से, (आर्जीकात्) सरलता से (सुतः) निष्पन्न होता हुआ अपने शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि को (आ