भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

पवस्व) पवित्र कर। (इन्द्राय) परमैश्वर्ययुक्त परमात्मा के लिए (परिस्रव) सब ओर से गमन कर ॥२॥ ऋ॒तं वद॑न्नृतद्युम्न स॒त्यं वद॑न्सत्यकर्मन्। श्र॒द्धां वद॑न्त्सोम राजन् धा॒त्रा सौम्॒ परि॑ष्कृत॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥३॥ अर्थ:—हे (ऋतद्युम्न) सत्यधन और सत्य कीर्तिवाले यतिवर! (ऋतं वदन्) पक्षपात छोड़के यथार्थ बोलता हुआ, हे (सत्यकर्मन्) सत्य, वेदोक्त कर्मवाले संन्यासिन्! (सत्यं वदन्) सत्य बोलता हुआ, (श्रद्धाम्) सत्यधारण में प्रीति करने को (वदन्) उपदेश करता हुआ, (सोम) सौम्यगुणसपन्न, (राजन्) सब ओर से प्रकाशयुक्त आत्मावाले, (सोम) योगैश्वर्ययुक्त (इन्दो) सबको आनन्ददायक संन्यासिन्! तू (धात्रा) सकल·विश्व के धारण करनेहारे परमात्मा से योगाभ्यास करके (परिष्कृतः) शुद्ध होता हुआ (इन्द्राय) योग से उत्पन्न हुए परमैश्वर्य की सिद्धि के लिए (परिस्रव) यथार्थ पुरुषार्थ कर ॥३॥ यत्र॒ ब्रह्मा प॑वमान छन्द॒स्यां१॒ वाचं॒ वद॑न्। ग्राव्णा॒ सोमे॑ महीय॒ते सोमे॑नान॒न्दं ज॒नय॒न्निन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥४॥ अर्थ:—हे (छन्दस्याम्) स्वतन्त्रतायुक्त (वाचम्) वाणी को (वदन्) कहते हुए (सोमेन) विद्या, योगाभ्यास और परमेश्वर की भक्ति से (आनन्दम्) सबके लिए आनन्द को (जनयन्) प्रगट करते हुए, (इन्दो) आनन्दप्रद, (पवमान) पवित्रात्मन्, पवित्र करनेवाले संन्यासिन्! (यत्र) जिस (सोमे) परमैश्वर्ययुक्त परमात्मा में (ब्रह्मा) चारों वेदों का जाननेवाला विद्वान् (महीयते) महत्त्व को प्राप्त होकर सत्कार को प्राप्त होता है, जैसे (ग्राव्णा) मेघ से सब जगत् को आनन्द होता है, वैसे तू सबको (इन्द्राय) परमैश्वर्य्ययुक्त मोक्ष का आनन्द देने के लिए सब साधनों को (परिस्रव) सब प्रकार से प्राप्त करा ॥४॥