संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २६७ यत्र॒ ज्योति॒रज॑स्रं॒ यस्मिँल्लो॒के स्व॑र्हि॒तम् । तस्मि॑न् मां धे॑हि पव॑माना॒मृते॑ लो॒के अक्षि॑त॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ५ ॥ अर्थ—हे (पवमान) अविद्यादि क्लेशों के नाश करनेवाले, पवित्रस्वरूप, (इन्दो) सर्वानन्ददायक परमात्मन् ! (यत्र) जहाँ— तेरे स्वरूप में (अजस्रम्) निरन्तर व्यापक तेरा (ज्योतिः) तेज है, (यस्मिन्) जिस (लोके) ज्ञान से देखने योग्य तुझमें (स्वः) नित्य सुख (हितम्) स्थित है, (तस्मिन्) उस (अमृते) जन्म- मरण और (अक्षिते) नाश से रहित (लोके) द्रष्टव्य अपने स्वरूप में आप (मा) मुझे (इन्द्राय) परमैश्वर्यप्राप्ति के लिए (धेहि) कृपा से धारण कीजिए और मुझपर माता के समान कृपाभाव से (परिस्रव) आनन्द की वर्षा कीजिए ॥ ५ ॥ यत्र॒ राजा॑ वैवस्व॒तो यत्रा॑व॒रोध॑नं दि॒वः । यत्रा॒मूर्यह्वती॒राप॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ६ ॥ अर्थ—हे (इन्दो) आनन्दप्रद परमात्मन्! (यत्र) जिस आपमें (वैवस्वतः) सूर्य का प्रकाश (राजा) प्रकाशमान हो रहा है, (यत्र) जिस आपमें (दिवः) बिजली, अथवा बुरी कामना की (अवरोधनम्) रुकावट है, (यत्र) जिस आपमें (अमूः) वे कारणरूप (यह्वतीः) बड़े व्यापक आकाशस्थ (आपः) प्राणप्रद वायु हैं, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझे (अमृतम्) मोक्ष में प्राप्त (कृधि) कीजिए। (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए (परिस्रव) आर्द्रभाव से आप मुझे प्राप्त होओ ॥ ६ ॥ यत्रा॑नु॒कामं चर॑णं त्रि॒नाके॑ त्रिं॒दिवे दि॒वः । लो॒का यत्र॒ ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ७ ॥ अर्थ—हे (इन्दो) परमात्मन् ! (यत्र) जिस आपमें (अनुकामम्) इच्छा के अनुकूल स्वतन्त्र (चरणम्) विहरना