भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

२६८ संस्कारविधिः है, (यत्र) जिस (त्रिनाके) त्रिविध, अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक दुःख से रहित, (त्रिदिवे) तीन—सूर्य, विद्युत् और भौम्य अग्नि से प्रकाशित सुखस्वरूप आपमें (दिवः) कामना करने योग्य शुद्ध कामनावाले, (लोकाः) यथार्थ ज्ञानयुक्त, (ज्योतिष्मन्तः) शुद्ध विज्ञानयुक्त, मुक्ति को प्राप्त हुए सिद्ध पुरुष विचरते हैं, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझे (अमृतम्) मोक्ष में प्राप्त (कृधि) कीजिए और (इन्द्राय) उस परम आनन्दैश्वर्य के लिए (परिस्रव) कृपा से प्राप्त होओ ॥७॥ यत्र॒ कामा॑ निका॒माश्च॒ यत्र॑ ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टप॑म्। स्व॒धा च॒ यत्र॒ तृप्ति॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥८॥ अर्थ—हे (इन्दो) निष्कामानन्दप्रद, सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्! (यत्र) जिस आपमें (कामाः) सब कामना (निकामाः) और अभिलाषा, छूट जाती है, (च) और (यत्र) जिस आपमें (ब्रध्नस्य) सबसे बड़े प्रकाशमान सूर्य का (विष्टपम्) विशिष्ट सुख, (च) और (यत्र) जिस आपमें (स्वधा) अपना ही धारण, (च) और जिस आपमें (तृप्तिः) पूर्ण तृप्ति है, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझे (अमृतम्) प्राप्त-मुक्तिवाला (कृधि) कीजिए तथा (इन्द्राय) सब दुःख-विदारण के लिए आप मुझपर (परिस्रव) करुणावृत्ति कीजिए॥८॥ यत्रा॑न॒न्दाश्च॒ मोदा॑श्च॒ मुदः॑ प्र॒मुद॒ आस॑ते। काम॑स्य॒ यत्रा॒प्ताः कामा॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥९॥ —ऋ० म० ९। सू० ११३॥ अर्थ—हे (इन्दो) सर्वानन्दयुक्त जगदीश्वर ! (यत्र) जिस आपमें (आनन्दाः) सम्पूर्ण समृद्धि, (च) और (मोदाः) सम्पूर्ण हर्ष, (मुदः) सम्पूर्ण प्रसन्नता, (च) और (प्रमुदः) प्रकृष्ट