संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम्' २६९ प्रसन्नता (आसते) स्थित हैं, (यत्र) जिस आपमें (कामस्य) अभिलाषी पुरुष की (कामाः) सब कामना (आसाः) प्राप्त होती हैं, (तत्र) उसी अपने स्वरूप में (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए (माम्) मुझे (अमृतम्) जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित मोक्षप्राप्तियुक्त कि जिससे मुक्ति के समय के मध्य में संसार में नहीं आना पड़ता, उस मुक्ति की प्राप्तिवाला (कृधि) कीजिए और इसी प्रकार सब जीवों को (परिस्रव) सब ओर से प्राप्त हूजिए॥९॥ यद्दे॑वा॒ यत॑यो यथा॒ भुव॑नान्यपि॑न्वत। अत्रा॑ समु॒द्र आ गूळ्हमा सूर्य॑मजभर्त्तन॥१०॥ —ऋ० मं० १०। सू० ७२। मं० ७॥ अर्थ—हे (देवाः) पूर्ण विद्वान् (यतयः) संन्यासी लोगो ! तुम (यथा) जैसे (अत्र) इस (समुद्रे) आकाश में (गूळ्हम्) गुप्त (आ सूर्यम्) स्वयं प्रकाशस्वरूप सूर्यादि का प्रकाशक परमात्मा है, उसको (आ अजभर्त्तन) चारों ओर से अपने आत्माओं में धारण करो और आनन्दित होओ, वैसे (यत्) जो (भुवनानि) सब भुवनस्थ गृहस्थादि मनुष्य हैं, उनको सदा (अपिन्वत) विद्या और उपदेश से संयुक्त किया करो, यही तुम्हारा परम धर्म है॥१०॥ भ॒द्रमि॒च्छन्त॒ ऋष॑यः स्व॒र्विद॒स्तपो॑ दी॒क्षामुप॑निषे॒दुरग्रे॑। ततो॑ रा॒ष्ट्रं बल॒मोज॑श्च जा॒तं तद॑स्मै दे॒वा उप॒संन॑मन्तु॥११॥ —अथर्व० का० १९। सू० ४१। मं० १॥ अर्थ—हे विद्वानो! जो (ऋषयः) वेदार्थविद्या को प्राप्त (स्वर्विदः) सुख को प्राप्त, (अग्रे) प्रथम (तपः) ब्रह्मचर्यरूप आश्रम को पूर्णता से सेवन तथा यथावत् स्थिरता से प्राप्त होके (भद्रम्) कल्याण की (इच्छन्तः) इच्छा करते हुए, (दीक्षाम्) संन्यास की दीक्षा को (उपनिषेदुः) ब्रह्मचर्य ही से प्राप्त होवें, उनका (देवाः) विद्वान् लोग (उपसंनमन्तु)