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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

संन्यासप्रकरणम् २६७ यत्र॒ ज्योति॒रज॑स्रं॒ यस्मिँल्लो॒के स्व॑र्हि॒तम् । तस्मि॑न् मां धे॑हि पव॑माना॒मृते॑ लो॒के अक्षि॑त॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ५ ॥ अर्थ—हे (पवमान) अविद्यादि क्लेशों के नाश करनेवाले, पवित्रस्वरूप, (इन्दो) सर्वानन्ददायक परमात्मन् ! (यत्र) जहाँ— तेरे स्वरूप में (अजस्रम्) निरन्तर व्यापक तेरा (ज्योतिः) तेज है, (यस्मिन्) जिस (लोके) ज्ञान से देखने योग्य तुझमें (स्वः) नित्य सुख (हितम्) स्थित है, (तस्मिन्) उस (अमृते) जन्म- मरण और (अक्षिते) नाश से रहित (लोके) द्रष्टव्य अपने स्वरूप में आप (मा) मुझे (इन्द्राय) परमैश्वर्यप्राप्ति के लिए (धेहि) कृपा से धारण कीजिए और मुझपर माता के समान कृपाभाव से (परिस्रव) आनन्द की वर्षा कीजिए ॥ ५ ॥ यत्र॒ राजा॑ वैवस्व॒तो यत्रा॑व॒रोध॑नं दि॒वः । यत्रा॒मूर्यह्वती॒राप॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ६ ॥ अर्थ—हे (इन्दो) आनन्दप्रद परमात्मन्! (यत्र) जिस आपमें (वैवस्वतः) सूर्य का प्रकाश (राजा) प्रकाशमान हो रहा है, (यत्र) जिस आपमें (दिवः) बिजली, अथवा बुरी कामना की (अवरोधनम्) रुकावट है, (यत्र) जिस आपमें (अमूः) वे कारणरूप (यह्वतीः) बड़े व्यापक आकाशस्थ (आपः) प्राणप्रद वायु हैं, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझे (अमृतम्) मोक्ष में प्राप्त (कृधि) कीजिए। (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए (परिस्रव) आर्द्रभाव से आप मुझे प्राप्त होओ ॥ ६ ॥ यत्रा॑नु॒कामं चर॑णं त्रि॒नाके॑ त्रिं॒दिवे दि॒वः । लो॒का यत्र॒ ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ७ ॥ अर्थ—हे (इन्दो) परमात्मन् ! (यत्र) जिस आपमें (अनुकामम्) इच्छा के अनुकूल स्वतन्त्र (चरणम्) विहरना

२६८ संस्कारविधिः है, (यत्र) जिस (त्रिनाके) त्रिविध, अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक दुःख से रहित, (त्रिदिवे) तीन—सूर्य, विद्युत् और भौम्य अग्नि से प्रकाशित सुखस्वरूप आपमें (दिवः) कामना करने योग्य शुद्ध कामनावाले, (लोकाः) यथार्थ ज्ञानयुक्त, (ज्योतिष्मन्तः) शुद्ध विज्ञानयुक्त, मुक्ति को प्राप्त हुए सिद्ध पुरुष विचरते हैं, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझे (अमृतम्) मोक्ष में प्राप्त (कृधि) कीजिए और (इन्द्राय) उस परम आनन्दैश्वर्य के लिए (परिस्रव) कृपा से प्राप्त होओ ॥७॥ यत्र॒ कामा॑ निका॒माश्च॒ यत्र॑ ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टप॑म्। स्व॒धा च॒ यत्र॒ तृप्ति॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥८॥ अर्थ—हे (इन्दो) निष्कामानन्दप्रद, सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्! (यत्र) जिस आपमें (कामाः) सब कामना (निकामाः) और अभिलाषा, छूट जाती है, (च) और (यत्र) जिस आपमें (ब्रध्नस्य) सबसे बड़े प्रकाशमान सूर्य का (विष्टपम्) विशिष्ट सुख, (च) और (यत्र) जिस आपमें (स्वधा) अपना ही धारण, (च) और जिस आपमें (तृप्तिः) पूर्ण तृप्ति है, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझे (अमृतम्) प्राप्त-मुक्तिवाला (कृधि) कीजिए तथा (इन्द्राय) सब दुःख-विदारण के लिए आप मुझपर (परिस्रव) करुणावृत्ति कीजिए॥८॥ यत्रा॑न॒न्दाश्च॒ मोदा॑श्च॒ मुदः॑ प्र॒मुद॒ आस॑ते। काम॑स्य॒ यत्रा॒प्ताः कामा॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥९॥ —ऋ० म० ९। सू० ११३॥ अर्थ—हे (इन्दो) सर्वानन्दयुक्त जगदीश्वर ! (यत्र) जिस आपमें (आनन्दाः) सम्पूर्ण समृद्धि, (च) और (मोदाः) सम्पूर्ण हर्ष, (मुदः) सम्पूर्ण प्रसन्नता, (च) और (प्रमुदः) प्रकृष्ट

संन्यासप्रकरणम्' २६९ प्रसन्नता (आसते) स्थित हैं, (यत्र) जिस आपमें (कामस्य) अभिलाषी पुरुष की (कामाः) सब कामना (आसाः) प्राप्त होती हैं, (तत्र) उसी अपने स्वरूप में (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए (माम्) मुझे (अमृतम्) जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित मोक्षप्राप्तियुक्त कि जिससे मुक्ति के समय के मध्य में संसार में नहीं आना पड़ता, उस मुक्ति की प्राप्तिवाला (कृधि) कीजिए और इसी प्रकार सब जीवों को (परिस्रव) सब ओर से प्राप्त हूजिए॥९॥ यद्दे॑वा॒ यत॑यो यथा॒ भुव॑नान्यपि॑न्वत। अत्रा॑ समु॒द्र आ गूळ्हमा सूर्य॑मजभर्त्तन॥१०॥ —ऋ० मं० १०। सू० ७२। मं० ७॥ अर्थ—हे (देवाः) पूर्ण विद्वान् (यतयः) संन्यासी लोगो ! तुम (यथा) जैसे (अत्र) इस (समुद्रे) आकाश में (गूळ्हम्) गुप्त (आ सूर्यम्) स्वयं प्रकाशस्वरूप सूर्यादि का प्रकाशक परमात्मा है, उसको (आ अजभर्त्तन) चारों ओर से अपने आत्माओं में धारण करो और आनन्दित होओ, वैसे (यत्) जो (भुवनानि) सब भुवनस्थ गृहस्थादि मनुष्य हैं, उनको सदा (अपिन्वत) विद्या और उपदेश से संयुक्त किया करो, यही तुम्हारा परम धर्म है॥१०॥ भ॒द्रमि॒च्छन्त॒ ऋष॑यः स्व॒र्विद॒स्तपो॑ दी॒क्षामुप॑निषे॒दुरग्रे॑। ततो॑ रा॒ष्ट्रं बल॒मोज॑श्च जा॒तं तद॑स्मै दे॒वा उप॒संन॑मन्तु॥११॥ —अथर्व० का० १९। सू० ४१। मं० १॥ अर्थ—हे विद्वानो! जो (ऋषयः) वेदार्थविद्या को प्राप्त (स्वर्विदः) सुख को प्राप्त, (अग्रे) प्रथम (तपः) ब्रह्मचर्यरूप आश्रम को पूर्णता से सेवन तथा यथावत् स्थिरता से प्राप्त होके (भद्रम्) कल्याण की (इच्छन्तः) इच्छा करते हुए, (दीक्षाम्) संन्यास की दीक्षा को (उपनिषेदुः) ब्रह्मचर्य ही से प्राप्त होवें, उनका (देवाः) विद्वान् लोग (उपसंनमन्तु)

२७० संस्कारविधिः यथावत् सत्कार किया करें। (ततः) तदनन्तर (राष्ट्रम्) राज्य (बलम्) बल (च) और (ओजः) पराक्रम (जातम्) उत्पन्न होवे, (तत्) उससे (अस्मै) इस संन्यासाश्रम के पालन के लिए यत्न किया करें॥११॥ अथ मनुस्मृतेश्श्लोकाः वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः। चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा संगान् परिव्रजेत्॥१॥ अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः। इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत्॥२॥ प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥३॥ यो दत्त्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात्। तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः॥४॥ आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः। समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत्॥५॥ अनग्निरनिकेतः स्याद् ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्। उपेक्षकोऽसङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः॥६॥ नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्। कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा॥७॥ दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥८॥ अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः। आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह॥९॥ क्लृप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्। विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन्॥१०॥ इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च। अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते॥११॥

संन्यासप्रकरणम् २७१ दूषितोऽपि चरेद् धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः। समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम्॥ १२॥ फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्। न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति॥ १३॥ प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत् कृताः। व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः॥ १४॥ दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्॥ १५॥ प्राणायामैर्दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम्। प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान्गुणान्॥ १६॥ उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयमकृतात्मभिः। ध्यानयोगेन संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः॥ १७॥ सम्यग्दर्शनसम्पन्नः कर्मभिर्न निबध्यते। दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते॥ १८॥ अहिंसयेन्द्रियासङ्गैर्वैदिकैश्चैव कर्मभिः। तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम्॥ १९॥ यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः। तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम्॥ २०॥ अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गाञ्शनैः शनैः। सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते॥ २१॥ इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम्। इदमन्विच्छतां स्वर्ग्यम् इदमानन्त्यमिच्छताम्॥ २२॥ अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः। स विधूयेह पाप्मानं परं ब्रह्माधिगच्छति॥ २३॥ अर्थ—इस प्रकार जंगलों में आयु का तीसरा भाग, अर्थात् अधिक-से-अधिक पच्चीस वर्ष, अथवा न्यून-से-न्यून बारह वर्ष तक विहार करके आयु के चौथे भाग, अर्थात् सत्तर वर्ष के पश्चात् सब मोहादि संगों को छोड़कर संन्यासी हो जावे ॥ १॥

२७२ संस्कारविधिः विधिपूर्वक ब्रह्मचर्याश्रम में सब वेदों को पढ़, गृहाश्रमी होकर धर्म से पुत्रोत्पत्ति कर, वानप्रस्थ में सामर्थ्य के अनुसार यज्ञ करके मोक्ष, अर्थात् संन्यासाश्रम में मन को लगावे ॥ २ ॥ प्रजापति परमात्मा की प्राप्ति के निमित्त प्राजापत्येष्टि कि जिसमें यज्ञोपवीत और शिखा का त्याग किया जाता है, कर आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि संज्ञक अग्नियों को आत्मा में समारोपित करके, ब्राह्मण विद्वान् गृहाश्रम से ही संन्यास लेवे ॥ ३ ॥ जो पुरुष सब प्राणियों को अभयदान, सत्योपदेश देकर गृहाश्रम से ही संन्यास ग्रहण कर लेता है, उस ब्रह्मवादी, वेदोक्त सत्योपदेशक संन्यासी को मोक्षलोक और सब लोक-लोकान्तर तेजोमय=ज्ञान से प्रकाशमय हो जाते हैं ॥ ४ ॥ जब सब कामों को जीत लेवे और उनकी अपेक्षा न रहे, पवित्रात्मा और पवित्रान्तःकरण, मननशील हो जावे तभी गृहाश्रम से निकलकर संन्यासाश्रम का ग्रहण करे, अथवा ब्रह्मचर्य ही से संन्यास का ग्रहण कर लेवे ॥ ५ ॥ वह संन्यासी अनग्निः*=आहवनीयादि अग्नियों से रहित और कहीं अपना स्वाभिमत घर भी न बाँधे और अन्न-वस्त्रादि के लिए ग्राम का आश्रय लेवे। बुरे मनुष्यों की उपेक्षाकर्त्ता और स्थिरबुद्धि, मननशील होकर परमेश्वर में अपनी भावना का समाधान करता हुआ विचरे ॥ ६ ॥ न तो अपने जीवन में आनन्द और न अपने मृत्यु में दुःख माने, किन्तु जैसे क्षुद्र भृत्य अपने स्वामी की आज्ञा की बाट

  • इसी पद से भ्रान्ति में पड़के संन्यासियों का दाह नहीं करते, और संन्यासी लोग अग्नि को नहीं छूते। यह पाप संन्यासियों के पीछे लग गया। यहाँ आहवनीयादि संज्ञक अग्नियों को छोड़ना है, स्पर्श व दाहकर्म छोड़ना नहीं है।

संन्यासप्रकरणम् २७३ देखता रहता है, वैसे ही काल और मृत्यु की प्रतीक्षा करता रहे ॥७॥ • चलते समय आगे-आगे देखके पग धरे। सदा वस्त्र से छानकर जल पीवे। सबसे सत्य वाणी बोले, अर्थात् सत्योपदेश ही किया करे। जो कुछ व्यवहार करे, वह सब मन की पवित्रता से आचरण करे ॥८॥ इस संसार में आत्मनिष्ठा में स्थित, सर्वथा अपेक्षारहित, मांस-मद्यादि का त्यागी, आत्मा के सहाय से ही सुखार्थी होकर विचरा करे और सबको सत्योपदेश करता रहे ॥९॥ सब शिर के बाल, दाढ़ी-मूँछ और नखों का समय-समय पर छेदन कराता रहे। पात्री, दण्डी और कुसुंभ के रंगे हुए* वस्त्रों को धारण किया करे। सब भूत=प्राणिमात्र को पीड़ा न देता हुआ दृढ़ात्मा होकर नित्य विचरण करे ॥१०॥ जो संन्यासी बुरे कामों से इन्द्रियों के निरोध, राग-द्वेषादि दोषों के क्षय और निर्वैरता से सब प्राणियों का कल्याण करता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है ॥११॥ चाहे संन्यासी को संसारी मूर्ख लोग निन्दा आदि से दूषित वा अपमानित भी करें, तथापि वह धर्म ही का आचरण करे। ऐसे ही अन्य ब्रह्मचर्याश्रमादि के मनुष्यों को करना उचित है। सब प्राणियों में पक्षपातरहित होकर समबुद्धि रक्खे—इत्यादि उत्तम काम करने ही के लिए संन्यासाश्रम का विधि है, किन्तु केवल दण्डादि चिह्न धारण करना ही धर्म का कारण नहीं है ॥१२॥ यद्यपि निर्मली वृक्ष का फल जल को शुद्ध करनेवाला है तथापि उसके नामग्रहणमात्र से जल शुद्ध नहीं होता, किन्तु उसको ले, पीस, जल में डालने ही से जल शुद्ध होता है।

  • अथवा गेरु से रँगे हुए वस्त्रों को पहिने।

२७४ संस्कारविधिः वैसे नाममात्र आश्रम से कुछ भी नहीं होता, किन्तु अपने-अपने आश्रम के धर्मयुक्त कर्म करने ही से आश्रमधारण सफल होता है, अन्यथा नहीं ॥ १३ ॥ इस पवित्र आश्रम को सफल करने के लिए संन्यासी पुरुष विधिवत् योगशास्त्र की रीति से सात व्याहृतियों के पूर्व सात प्रणव लगाके, जैसाकि पृष्ठ २१८ में प्राणायाम का मन्त्र लिखा है, उसे मन से जपता हुआ तीन भी प्राणायाम करे तो जानो अत्युत्कृष्ट तप करता है॥१४॥ जैसे अग्नि में तपाने से धातुओं के मल छूट जाते हैं, वैसे ही प्राण के निग्रह से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं॥१५॥ इसलिए संन्यासी लोग प्राणायामों से दोषों को धारणाओं से अन्तःकरण के मैल को, प्रत्याहार से सङ्ग से हुए दोषों और ध्यान से अविद्या, पक्षपात आदि अनीश्वरता के दोषों को छुड़ाके, पक्षपातरहित आदि ईश्वर के गुणों को धारण कर, सब दोषों को भस्म कर देवे ॥१६॥ बड़े-छोटे प्राणी और अप्राणियों में जो अशुद्धात्माओं से देखने के योग्य नहीं है, उस अन्तर्यामी परमात्मा की गति, अर्थात् प्राप्ति को ध्यानयोग से ही संन्यासी देखा करे॥१७॥ जो संन्यासी यथार्थ ज्ञान वा षड्दर्शनों से युक्त है, वह दुष्ट कर्मों से बद्ध नहीं होता और जो ज्ञान, विद्या, योगाभ्यास, सत्सङ्ग, धर्मानुष्ठान वा षड्दर्शनों से रहित विज्ञानहीन होकर संन्यास लेता है, वह संन्यास पदवी और मोक्ष को प्राप्त न होकर जन्म-मरणरूप संसार को प्राप्त होता है और ऐसे मूर्ख, अधर्मी को संन्यास का लेना व्यर्थ और धिक्कार देने के योग्य है॥१८॥ और जो निर्वैर, इन्द्रियों के विषयों के बन्धन से पृथक्, वैदिक कर्माचरणों और प्राणायाम, सत्यभाषणादि उत्तम, उग्र कर्मों से सहित संन्यासी लोग होते हैं, वे इसी जन्म, इसी वर्त्तमान समय में परमेश्वर की प्राप्तिरूप पद को प्राप्त होते हैं। उनका

संन्यासप्रकरणम् २७५ संन्यास लेना सफल और धन्यवाद के योग्य है ॥ १९ ॥ जब संन्यासी सब पदार्थों में अपनेपन के भाव से निःस्पृह होता है, तभी इस लोक, इस जन्म और मरण पाकर परलोक और मुक्ति में परमात्मा को प्राप्त होके निरन्तर* सुख को प्राप्त होता है॥२०॥ इस विधि से धीरे-धीरे सब संग से हुए दोषों को छोड़के सब हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से विशेषकर निर्मुक्त होके विद्वान् संन्यासी ब्रह्म ही में स्थिर होता है ॥ २१ ॥ और जो विविदिषा, अर्थात् जानने की इच्छा करके गौण संन्यास लेवे वह भी विद्या का अभ्यास, सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास और ओंकार का जप और उसके अर्थ=परमेश्वर का विचार भी किया करे। यही अज्ञानियों का शरण, अर्थात् गौण संन्यासियों और यही विद्वान् संन्यासियों का और यही सुख का खोज करनेवाले और यही अनन्त** सुख की इच्छा करनेवाले मनुष्यों का आश्रय है ॥ २२ ॥ इस क्रमानुसार संन्यासयोग से जो द्विज, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य संन्यास ग्रहण करता है वह इस संसार और शरीर में सब पापों को छोड़-छुड़ाके परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ विधि—जो पुरुष संन्यास लेना चाहे वह जिस दिन सर्वथा प्रसन्नता हो उसी दिन से नियम और व्रत, अर्थात् तीन दिन तक दुग्धपान करके उपवास और भूमि में शयन और प्राणायाम, ध्यान तथा एकान्तदेश में ओंकार का जप किया करे और पृष्ठ २२-२४ में लिखे प्रमाणे सभामण्डप, वेदी, समिधा,

  • निरन्तर शब्द का इतना ही अर्थ है कि मुक्ति के नियत समय के मध्य में दुःख आकर विघ्न नहीं कर सकता। ** अनन्त इतना ही है कि मुक्तिसुख के समय में अन्त अर्थात् जिसका नाश न होवे।

२७६ संस्कारविधिः घृतादि शाकल्य, सामग्री एक दिन पूर्व कर रखनी। पश्चात् जिस दिन संन्यास लेना हो, प्रहर रात्रि से उठकर शौच, स्नानादि आवश्यक कर्म करके, प्राणायाम, ध्यान और प्रणव का जप करता रहे। सूर्योदय के समय उत्तम गृहस्थ धार्मिक विद्वानों का पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे वरण कर, पृ० १३-२१ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन-शान्तिकरण का पाठ कर, पृष्ठ ३० से पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, घृतप्रतपन और स्थालीपाक करके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर जलप्रोक्षण, आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, तथा— ओं भुवनपतये स्वाहा॥ ओं भूतानां पतये स्वाहा॥ ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इनमें से एक-एक मन्त्र से एक-एक करके ग्यारह आज्याहुति देके जो विधिपूर्वक भात बनाया हो उसमें घृत सेचन करके, यजमान जोकि संन्यास का लेनेवाला है और दो ऋत्विज् निम्नलिखित स्वाहान्त मन्त्रों से भात का होम और शेष दो ऋत्विज् भी साथ-साथ घृताहुति करते जावें— ओं ब्रह्म॒ होता॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञो ब्रह्म॑णा॒ स्वर॑वो मि॒ताः। अ॒ध्व॒र्युर्ब्रह्म॑णो जा॒तो ब्रह्म॑णो॒ऽन्तर्हितं॑ ह॒विः स्वाहा॑॥ १ ॥ ब्रह्म॒ स्रुचो॑ घृ॒तवती॑र्ब्रह्म॑णा॒ वेदि॒रुद्धि॑ता। ब्रह्म॑ य॒ज्ञश्च॑ स॒त्रं च॒ ऋत्विजो॒ ये ह॑वि॒ष्कृत॑:। श॒मिताय॒ स्वाहा॑॥ २ ॥ अं॒हो॒मुचे॒ प्र भरे मनी॒षामा सु॒त्राम्णै॑ सु॒म॒तिमा॑वृणा॒नः। इ॒दमि॑न्द्र॒ प्रति॑ ह॒व्यं गृ॑भाय स॒त्याः स॑न्तु॒ यज॑मानस्य॒ कामाः॒ स्वाहा॑॥ ३ ॥

संन्यासप्रकरणम् २७७ अं॒हो॒मुचे॒ वृष॑भं य॒ज्ञिया॑नां वि॒राज॑न्तं प्रथ॒मम॑ध्व॒राणा॑म् । अ॒पां नपा॑तमश्विना हुवे धि॒येन्द्रेण॑ म इन्द्रि॒यं द॑त्त॒मोज॒: स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । अ॒ग्निर्मा॒ तत्र॑ नयत्व॒ग्निर्मेधां द॑धातु मे । अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये—इदन्र मम ॥ ५ ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । वा॒युर्मा॒ तत्र॑ नयतु वा॒युः प्रा॒णान् द॑धातु मे । वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ इदं वायवे—इदन्र मम ॥ ६ ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । सूर्यो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु चक्षुः॒ सूर्यो॑ दधातु मे । सूर्या॑य॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सूर्याय—इदन्र मम ॥ ७ ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । च॒न्द्रो मा॒ तत्र॑ नयतु मन॑श्च॒न्द्रो द॑धातु मे । च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑ ॥ इदं चन्द्राय—इदन्र मम ॥ ८ ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । सोमो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु पयः॒ सोमो॑ दधातु मे । सोमा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ इदं सोमाय—इदन्र मम ॥ ९ ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । इन्द्रो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु बल॒मिन्द्रो॑ दधातु मे । इन्द्रा॑य स्वाहा॑ ॥ इदमिन्द्राय—इदन्र मम ॥ १० ॥ यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । आपो॑ मा॒ तत्र॑ नयन्त्व॒मृतं॒ मोप॑ तिष्ठतु । अ॒द्भ्यः स्वाहा॑ ॥ इदमद्भ्यः—इदन्र मम ॥ ११ ॥

२७८ संस्कारविधिः यत्र॑ ब्रह्म॒विदो यान्ति॑ दी॒क्षया तप॑सा स॒ह। ब्रह्मा मा॒ तत्र॑ नयतु॒ ब्रह्मा॒ ब्रह्म॑ दधातु मे। ब्रह्म॑णे॒ स्वाहा॑ ॥ इदं ब्रह्मणे— इदन्न मम ॥ १२ ॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४२-४३ ॥ ओं प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ १ ॥ वाङ् मनश्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राणरेतोबुद्ध्याकूतिसंकल्पा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ २ ॥ शिरःपाणिपादपार्श्वपृष्ठोरूदरजङ्घ्न शिश्नोपस्थपायवो मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ३ ॥ त्वक्चर्ममाꣳसरुधिरमेदोमज्जास्नावयोऽस्थीनि मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विर॒जा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ४ ॥ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ५ ॥ पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशा मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ६ ॥ अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ ७ ॥ विविष्टयै स्वाहा ॥ ८ ॥ कषोत्काय स्वाहा ॥ ९ ॥ उत्तिष्ठ पुरुष हरित लोहित पिङ्गलाक्षि। देहि देहि ददापयिता मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथ्ँ स्वाहा ॥ १० ॥

संन्यासप्रकरणम् २७९ ओं स्वाहा मनोवाक्कायकर्माणि मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ ११ ॥ अव्यक्तभावैरहङ्कारैर्ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ १२ ॥ आत्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ १३ ॥ अन्तरात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा ॥ १४ ॥ परमात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासथँ स्वाहा* ॥ १५ ॥ इन १५ मन्त्रों में से एक-एक करके भात की आहुति देनी। पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से ३५ घृताहुति देवें— ओमग्नये स्वाहा ॥ १६ ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ १७ ॥ ओं ध्रुवाय भूमाय स्वाहा ॥ १८ ॥ ओं ध्रुवक्षितये स्वाहा ॥ १९ ॥ ओमच्युतक्षितये स्वाहा ॥ २० ॥ ओमग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ २१ ॥ ओं धर्माय स्वाहा ॥ २२ ॥ ओमधर्माय स्वाहा ॥ २३ ॥

  • (प्राणापान) इत्यादि से लेके (परमात्मा मे शुध्यताम्) इत्यन्त मन्त्रों से संन्यासी के लिए उपदेश है, अर्थात् जो संन्यासाश्रम ग्रहण करे वह धर्माचरण, सत्योपदेश, योगाभ्यास, शम, दम, शान्ति, सुशीलतादि, विद्या-विज्ञानादि शुभ, गुण, कर्म, स्वभावों से सहित होकर, परमात्मा को अपना सहायक मानकर, अत्यन्त पुरुषार्थ से शरीर प्राण, मन, इन्द्रियादि को अशुद्ध व्यवहार से हटा शुद्ध व्यवहार में चलाके, पक्षपात कपट अधर्म व्यवहारों को छोड़, अन्य के दोष पढ़ाने और उपदेश से छुड़ाकर, स्वयं आनन्दित होके, सब मनुष्यों को आनन्द पहुँचाता रहे।

२८० संस्कारविधिः ओमद्भ्यः स्वाहा ॥ २४ ॥ ओमोषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा ॥ २५ ॥ ओं रक्षोदेवजनेभ्यः स्वाहा ॥ २६ ॥ ओं गृह्याभ्यः स्वाहा ॥ २७ ॥ ओमवसानेभ्यः स्वाहा ॥ २८ ॥ ओमवसानपतिभ्यः स्वाहा ॥ २९ ॥ ओं सर्वभूतेभ्यः स्वाहा ॥ ३० ॥ ओं कामाय स्वाहा ॥ ३१ ॥ ओमन्तरिक्षाय स्वाहा ॥ ३२ ॥ ओं पृथिव्यै स्वाहा ॥ ३३ ॥ ओं दिवे स्वाहा ॥ ३४ ॥ ओं सूर्याय स्वाहा ॥ ३५ ॥ ओं चन्द्रमसे स्वाहा ॥ ३६ ॥ ओं नक्षत्रेभ्यः स्वाहा ॥ ३७ ॥ ओमिन्द्राय स्वाहा ॥ ३८ ॥ ओं बृहस्पतये स्वाहा ॥ ३९ ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ ४० ॥ ओं ब्रह्मणे स्वाहा ॥ ४१ ॥ ओं देवेभ्यः स्वाहा ॥ ४२ ॥ ओं परमेष्ठिने स्वाहा ॥ ४३ ॥ ओं तद् ब्रह्म ॥ ४४ ॥ ओं तद्वायुः ॥ ४५ ॥ ओं तदात्मा ॥ ४६ ॥ ओं तत्सत्यम् ॥ ४७ ॥ ओं तत्सर्वम् ॥ ४८ ॥ ओं तत्पुरोर्नमः ॥ ४९ ॥ अन्तश्चरति भूतेषु गुहायां विश्वमूर्तिषु। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमिन्द्रस्त्वं रुद्रस्त्वग्ं विष्णुस्त्वं ब्रह्म त्वं प्रजापतिः। त्वं तदाप आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरों स्वाहा* ॥ ५० ॥

  • ये सब प्राणापानव्यान० आदि मन्त्र तैत्तिरीय आरण्यक दशम प्रपाठक अनुवाक ५१।५२।५३।५४।५५।५६।५७।५८।५९।६०। ६६।६७।६८ के हैं।

संन्यासप्रकरणम् २८१ इन ५० मन्त्रों से आज्याहुति देके तदनन्तर जो संन्यास लेनेवाला है, वह पाँच वा छह केशों को छोड़कर पृष्ठ ८६- ८७ में लिखे प्रमाणे दाढ़ी, मूँछ, केश, लोमों का छेदन, अर्थात् क्षौर कराके यथावत् स्नान करे। तदनन्तर संन्यास लेनेवाला पुरुष अपने शिर पर पुरुषसूक्त के मन्त्रों से १०८ बार अभिषेक करे। पुनः पृष्ठ २१७-२१८ में लिखे प्रमाणे आचमन और प्राणायाम करके, हाथ जोड़, वेदी के सामने नेत्रोन्मीलन कर मन से— ओं ब्रह्मणे नमः ॥ ओ३मिन्द्राय नमः ॥ ओं सूर्याय नमः ॥ ओं सोमाय नमः ॥ ओमात्मने नमः ॥ ओमन्तरात्मने नमः ॥ इन छह मन्त्रों को जपके— ओमात्मने स्वाहा ॥ ओमन्तरात्मने स्वाहा ॥ ओं परमात्मने स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इन चार मन्त्रों से चार आज्याहुति देकर, कार्यकर्त्ता—संन्यास ग्रहण करनेवाला पुरुष पृष्ठ १५२-१५३ में लिखे प्रमाणे मधुपर्क की क्रिया करे। तदनन्तर प्राणायाम करके— ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि ॥ ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ इन मन्त्रो को मन से जपे। पुनः— ओम् अग्नये स्वाहा ॥ ओं भूः प्रजापंतये स्वाहा ॥ ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥

२८२ संस्कारविधिः ओं ब्रह्मणे स्वाहा ॥ ओं प्राणाय स्वाहा ॥ ओमपानाय स्वाहा ॥ ओं व्यानाय स्वाहा ॥ ओमुदानाय स्वाहा ॥ ओं समानाय स्वाहा ॥ इन मन्त्रों से वेदी में आज्याहुति देके— ओं भूः स्वाहा ॥ इन मन्त्र से पूर्णाहुति करके— पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्चोत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति* ॥ —श० कां० १४ पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणा मया परित्यक्ता, मत्तः सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु स्वाहा* ॥ इस वाक्य को बोलके सबके सामने जल को भूमि में छोड़ देवे। पीछे नाभिमात्र जल में पूर्वाभिमुख खड़ा रहकर— ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि ॥ ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि परो रजसेऽसावदोम् ॥ इसका मनसे जप करके प्रणवार्थ परमात्मा का ध्यान करके

  • पुत्रादि के मोह, वित्तादि पदार्थों के मोह और लोकस्थ प्रतिष्ठा की इच्छा से मन को हटाकर परमात्मा में आत्मा को दृढ़ करके जो भिक्षाचरण करते हैं वे ही सबको सत्योपदेश से अभयदान देते हैं, अर्थात् दाहिने हाथ में जल लेके मैंने आज से पुत्रादि का तथा वित्त का मोह और लोक में प्रतिष्ठा की इच्छा करने का त्याग कर दिया, और मुझसे सब भूत=प्राणिमात्र को अभय प्राप्त होवे, यह मेरी सत्य वाणी है।

संन्यासप्रकरणम् २८३ पूर्वोक्त (पुत्रैषणायाश्च०) इस समग्र कण्डिका को बोलके प्रैष्य मन्त्रोच्चारण करे। ओं भूः संन्यस्तं मया। ओं भुवः संन्यस्तं मया। ओं स्वः संन्यस्तं मया॥ इस मन्त्र का मन से उच्चारण करे। तत्पश्चात् जल से अञ्जलि भर पूर्वाभिमुख होकर संन्यास लेनेवाला— ओम् अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा॥ इस मन्त्र से दोनों हाथ की अञ्जलि को पूर्व दिशा में छोड़ देवे। येना॑ स॒हस्रं॒ वह॑सि॒ येना॑ग्ने सर्ववे॒दस॑म्। तेने॒मं य॒ज्ञं नो॑ वह॒ स्वर्द्देवेषु॒ गन्त॑वे* ॥ —अथर्व० कां० ९। सू० ५। मं० १७॥ और इसी पर स्मृति है— प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥ इस श्लोक का अर्थ पहले लिख दिया है। इसके पश्चात् मौन करके शिखा के लिए जो पाँच वा सात केश रक्खे थे उनको एक-एक उखाड़ और यज्ञोपवीत उतारकर हाथ में ले-जल की अञ्जलि भर— ओमापो वै सर्वा देवताः स्वाहा॥ ओम् भूः स्वाहा॥ * हे (अग्ने) विद्वन्! (येन) जिससे (सहस्रम्) सब संसार को अग्नि धारण करता है, और (येन) जिससे तू (सर्ववेदसम्) गृहाश्रमस्थ पदार्थमोह, यज्ञोपवीत और शिखा आदि को (वहसि) धारण करता है, उनको छोड़। (तेन) उस त्याग से (नः) हमको (इमम्) यह संन्यासरूप (स्वाहा) सुख देनेहारे (यज्ञम्) प्राप्त होने योग्य यज्ञ को .(देवेषु) विद्वानों में (गन्तवे) जाने को (वह) प्राप्त हो।

२८४ संस्कारविधिः इन मन्त्रों से शिखा के बाल और यज्ञोपवीतसहित जलाञ्जलि को जल में होम कर देवे। उसके पश्चात् आचार्य शिष्य को जल से निकालके काषाय वस्त्र की कोपीन, कंटिवस्त्र, उपवस्त्र, अङ्गोछा प्रीतिपूर्वक देवे और शिष्य पृष्ठ १०४ में लिखे प्रमाणे (यो मे दण्डः०) इस मन्त्र से दण्ड धारण करके आत्मा में आहवनीयादि अग्नियों का आरोपण करे। यो वि॒द्याद्ब्रह्म॑ प्र॒त्यक्षं॒ परूं॑षि॒ यस्य॑ सं॒भारा॒ ऋचो॒ यस्या॑नू॒क्य॑म्¹ ॥ १ ॥ सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॑नि॒ यजु॒र्हृद॑यमु॒च्यते॑ परिस्तर॑ण॒मिद्ब॒र्हिः² ॥ २ ॥ यद्वा अ॑ति॑थिप॒तिर॑ति॒थीन् प्रति॒ पश्य॑ति दे॒वयज॑नं॒ प्रेक्ष॑ते³ ॥ ३ ॥ १. (यः) जो पुरुष (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारता से (ब्रह्म) परमात्मा को (विद्यात्) जाने, (यस्य) जिसके (परूंषि) कठोर स्वभाव आदि (संभाराः) होम करने के साकल्य और (यस्य) जिसके (ऋचः) यथार्थ सत्यभाषण, सत्योपदेश और ऋग्वेद ही (अनूक्यम्) अनुकूलता से कहने योग्य वचन हैं, वही संन्यास ग्रहण करे ॥ १ ॥ २. (यस्य) जिसके (सामानि) सामवेद (लोमानि) लोम के समान, (यजुः) यजुर्वेद जिसके (हृदयम्) हृदय के समान (उच्यते) कहा जाता है, (परिस्तरणम्) जो सब ओर से शस्त्र आसन आदि सामग्री (हविरित्) होम करने योग्य के समान हैं, वह संन्यास ग्रहण करने में योग्य होता है ॥ २ ॥ ३. (वा) वा (यत्) जो (अतिथिपतिः) अतिथियों का पालन करनेहारा (अतिथीन्) अतिथियों के प्रति (प्रतिपश्यति) देखता है, वही विद्वान् संन्यासियों में (देवयजनम्) विद्वानों के यजन करने के समान (प्रेक्षते) ज्ञानदृष्टि से देखता और संन्यास लेने का अधिकारी होता है ॥ ३ ॥

संन्यासप्रकरणम् २८५ यद॒भि॒वद॑ति दी॒क्षामुपै॑ति॒ यदु॑द॒कं याच॑न्त्य॒पः प्र ण॑यति१ ॥४॥ या ए॒व य॒ज्ञ आप॑: प्र॒णी॒यन्ते॒ ता ए॒व ताः२ ॥५॥ यदा॑व॒स॒थान् क॒ल्पय॑न्ति॒ सदो॑ह॒विर्धाना॒न्येव तत्क॑ल्पयन्ति३ ॥६॥ यदुप॑स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॒व तत्४ ॥७॥ तेषा॒मास॑न्नाना॒मति॑थिरा॒त्मन् जु॑होति५ ॥८॥ १. और (यत्) जो संन्यासी (अभिवादति) दूसरे के साथ संवाद वा दूसरे को अभिवादन करता है, वह जानो (दीक्षाम्) दीक्षा को (उपैति) प्राप्त होता है, (यत्) जो (उदकम्) जल की (याचति) याचना करता है, वह जानो (अपः) प्रणीता आदि में जल को (प्रणयति) डालता है॥४॥ २. (यज्ञे) यज्ञ में (याः एव) जिन्हीं (आपः) जलों का (प्रणीयन्ते) प्रयोग किया जाता है (ता एव) वे ही (ताः) पात्र में रखे जल संन्यासी की यज्ञस्थ जलक्रिया हैं॥५॥ ३. संन्यासी (यत्) जो (आवसथान्) निवास का स्थान (कल्पयन्ति) कल्पना करते हैं, वे (सदः) यज्ञशाला (हविर्धानान्येव) हविष् के स्थापन करने के ही पात्र (तत्) वे (कल्पयन्ति) समर्थित करते हैं॥६॥ ४. और (यत्) जो संन्यासी लोग (उपस्तृणन्ति) बिछौने आदि करते हैं (बर्हिरेव तत्) वह कुशपिञ्जूली के समान है॥७॥ ५. और जो (तेषाम्) उन (आसन्नानाम्) समीप बैठनेहारों के निकट बैठा हुआ, (अतिथिः) जिसकी कोई नियत तिथि न हो, वह भोजनादि करता है, वह (आत्मन्) जानो वेदीस्थ अग्नि में होम करने के समान आत्मा में (जुहोति) आहुतियाँ देता है॥८॥

२८६ संस्कारविधिः स्रु॒चा हस्ते॑न प्रा॒णे यू॒पे स्रुङ्का॒रेण॑ वषट्का॒रेण॑१ ॥ ९ ॥ ए॒ते वै प्रि॒याश्चाप्रि॑याश्च॒र्त्विज॑: स्व॒र्गं लो॒कं ग॑मयन्ति॒ यदति॑थयः२ ॥१० ॥ प्रा॒जा॒पत्यो वा ए॒तस्य॑ य॒ज्ञो वित॑तो॒ य उप॑हरति३ ॥ ११ ॥ प्र॒जाप॑ते॒र्वा ए॒ष वि॑क्र॒मान॑नुवि॒क्रम॑ते॒ य उप॑हरति४ ॥ १२ ॥ १. और जो संन्यासी (हस्तेन) हाथ से खाता है वह जानो (स्रुचा) चमसा आदि से वेदी में आहुति देता है, जैसे (यूपे) स्तम्भे में अनेक प्रकार के पशु आदि को बाँधते हैं वैसे वह संन्यासी (स्रुक्कारेण) स्रुचा के समान (वषट्कारेण) होमक्रिया के तुल्य (प्राणे) प्राण में मन और इन्द्रियों को बाँधता है॥९॥ २. (एते वै) ये ही (ऋत्विजः) समय-समय में प्राप्त होनेवाले (प्रियाः च अप्रियाः च) प्रिय और अप्रिय भी संन्यासी जन (यत्) जिस कारण (अतिथयः) अतिथिरूप हैं, इससे गृहस्थ को (स्वर्गं लोकम्) दर्शनीय अत्यन्त सुख को (गमयन्ति) प्राप्त कराते हैं॥१०॥ ३. (एतस्य) इस संन्यासी का (प्राजापत्यः) प्रजापति परमात्मा को जानने का आश्रमधर्मानुष्ठान रूप (यज्ञः) अच्छे प्रकार करने योग्य यतिधर्म (विततः) व्यापक है, अर्थात् (यः) जो इसको सर्वोपरि (उपहरति) स्वीकार करता है (वै) वही संन्यासी होता है॥११॥ ४. (यः) जो (एषः) यह संन्यासी (प्रजापतेः) परमेश्वर के जानने रूप संन्यासाश्रम के (विक्रमान्) सत्याचारों की (अनुविक्रमते) अनुकूलता से क्रिया करता है, (वै) वही सब शुभगुणों को (उपहरति) स्वीकार करता है॥१२॥