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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 318 में से

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पृष्ठ 288

२८४ संस्कारविधिः इन मन्त्रों से शिखा के बाल और यज्ञोपवीतसहित जलाञ्जलि को जल में होम कर देवे। उसके पश्चात् आचार्य शिष्य को जल से निकालके काषाय वस्त्र की कोपीन, कंटिवस्त्र, उपवस्त्र, अङ्गोछा प्रीतिपूर्वक देवे और शिष्य पृष्ठ १०४ में लिखे प्रमाणे (यो मे दण्डः०) इस मन्त्र से दण्ड धारण करके आत्मा में आहवनीयादि अग्नियों का आरोपण करे। यो वि॒द्याद्ब्रह्म॑ प्र॒त्यक्षं॒ परूं॑षि॒ यस्य॑ सं॒भारा॒ ऋचो॒ यस्या॑नू॒क्य॑म्¹ ॥ १ ॥ सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॑नि॒ यजु॒र्हृद॑यमु॒च्यते॑ परिस्तर॑ण॒मिद्ब॒र्हिः² ॥ २ ॥ यद्वा अ॑ति॑थिप॒तिर॑ति॒थीन् प्रति॒ पश्य॑ति दे॒वयज॑नं॒ प्रेक्ष॑ते³ ॥ ३ ॥ १. (यः) जो पुरुष (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारता से (ब्रह्म) परमात्मा को (विद्यात्) जाने, (यस्य) जिसके (परूंषि) कठोर स्वभाव आदि (संभाराः) होम करने के साकल्य और (यस्य) जिसके (ऋचः) यथार्थ सत्यभाषण, सत्योपदेश और ऋग्वेद ही (अनूक्यम्) अनुकूलता से कहने योग्य वचन हैं, वही संन्यास ग्रहण करे ॥ १ ॥ २. (यस्य) जिसके (सामानि) सामवेद (लोमानि) लोम के समान, (यजुः) यजुर्वेद जिसके (हृदयम्) हृदय के समान (उच्यते) कहा जाता है, (परिस्तरणम्) जो सब ओर से शस्त्र आसन आदि सामग्री (हविरित्) होम करने योग्य के समान हैं, वह संन्यास ग्रहण करने में योग्य होता है ॥ २ ॥ ३. (वा) वा (यत्) जो (अतिथिपतिः) अतिथियों का पालन करनेहारा (अतिथीन्) अतिथियों के प्रति (प्रतिपश्यति) देखता है, वही विद्वान् संन्यासियों में (देवयजनम्) विद्वानों के यजन करने के समान (प्रेक्षते) ज्ञानदृष्टि से देखता और संन्यास लेने का अधिकारी होता है ॥ ३ ॥

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक) · पृष्ठ 288, कुल 318 में से · BharatKosha