संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २८५ यद॒भि॒वद॑ति दी॒क्षामुपै॑ति॒ यदु॑द॒कं याच॑न्त्य॒पः प्र ण॑यति१ ॥४॥ या ए॒व य॒ज्ञ आप॑: प्र॒णी॒यन्ते॒ ता ए॒व ताः२ ॥५॥ यदा॑व॒स॒थान् क॒ल्पय॑न्ति॒ सदो॑ह॒विर्धाना॒न्येव तत्क॑ल्पयन्ति३ ॥६॥ यदुप॑स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॒व तत्४ ॥७॥ तेषा॒मास॑न्नाना॒मति॑थिरा॒त्मन् जु॑होति५ ॥८॥ १. और (यत्) जो संन्यासी (अभिवादति) दूसरे के साथ संवाद वा दूसरे को अभिवादन करता है, वह जानो (दीक्षाम्) दीक्षा को (उपैति) प्राप्त होता है, (यत्) जो (उदकम्) जल की (याचति) याचना करता है, वह जानो (अपः) प्रणीता आदि में जल को (प्रणयति) डालता है॥४॥ २. (यज्ञे) यज्ञ में (याः एव) जिन्हीं (आपः) जलों का (प्रणीयन्ते) प्रयोग किया जाता है (ता एव) वे ही (ताः) पात्र में रखे जल संन्यासी की यज्ञस्थ जलक्रिया हैं॥५॥ ३. संन्यासी (यत्) जो (आवसथान्) निवास का स्थान (कल्पयन्ति) कल्पना करते हैं, वे (सदः) यज्ञशाला (हविर्धानान्येव) हविष् के स्थापन करने के ही पात्र (तत्) वे (कल्पयन्ति) समर्थित करते हैं॥६॥ ४. और (यत्) जो संन्यासी लोग (उपस्तृणन्ति) बिछौने आदि करते हैं (बर्हिरेव तत्) वह कुशपिञ्जूली के समान है॥७॥ ५. और जो (तेषाम्) उन (आसन्नानाम्) समीप बैठनेहारों के निकट बैठा हुआ, (अतिथिः) जिसकी कोई नियत तिथि न हो, वह भोजनादि करता है, वह (आत्मन्) जानो वेदीस्थ अग्नि में होम करने के समान आत्मा में (जुहोति) आहुतियाँ देता है॥८॥