भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 290

२८६ संस्कारविधिः स्रु॒चा हस्ते॑न प्रा॒णे यू॒पे स्रुङ्का॒रेण॑ वषट्का॒रेण॑१ ॥ ९ ॥ ए॒ते वै प्रि॒याश्चाप्रि॑याश्च॒र्त्विज॑: स्व॒र्गं लो॒कं ग॑मयन्ति॒ यदति॑थयः२ ॥१० ॥ प्रा॒जा॒पत्यो वा ए॒तस्य॑ य॒ज्ञो वित॑तो॒ य उप॑हरति३ ॥ ११ ॥ प्र॒जाप॑ते॒र्वा ए॒ष वि॑क्र॒मान॑नुवि॒क्रम॑ते॒ य उप॑हरति४ ॥ १२ ॥ १. और जो संन्यासी (हस्तेन) हाथ से खाता है वह जानो (स्रुचा) चमसा आदि से वेदी में आहुति देता है, जैसे (यूपे) स्तम्भे में अनेक प्रकार के पशु आदि को बाँधते हैं वैसे वह संन्यासी (स्रुक्कारेण) स्रुचा के समान (वषट्कारेण) होमक्रिया के तुल्य (प्राणे) प्राण में मन और इन्द्रियों को बाँधता है॥९॥ २. (एते वै) ये ही (ऋत्विजः) समय-समय में प्राप्त होनेवाले (प्रियाः च अप्रियाः च) प्रिय और अप्रिय भी संन्यासी जन (यत्) जिस कारण (अतिथयः) अतिथिरूप हैं, इससे गृहस्थ को (स्वर्गं लोकम्) दर्शनीय अत्यन्त सुख को (गमयन्ति) प्राप्त कराते हैं॥१०॥ ३. (एतस्य) इस संन्यासी का (प्राजापत्यः) प्रजापति परमात्मा को जानने का आश्रमधर्मानुष्ठान रूप (यज्ञः) अच्छे प्रकार करने योग्य यतिधर्म (विततः) व्यापक है, अर्थात् (यः) जो इसको सर्वोपरि (उपहरति) स्वीकार करता है (वै) वही संन्यासी होता है॥११॥ ४. (यः) जो (एषः) यह संन्यासी (प्रजापतेः) परमेश्वर के जानने रूप संन्यासाश्रम के (विक्रमान्) सत्याचारों की (अनुविक्रमते) अनुकूलता से क्रिया करता है, (वै) वही सब शुभगुणों को (उपहरति) स्वीकार करता है॥१२॥