संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 291, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २८७ योऽति॒थीनां॒ स आ॑हव॒नीयो॒ यो वेश्म॑नि॒ स गार्ह॑पत्यो॒ यस्मि॒न् पच॑न्ति॒ स दक्षि॑णा॒ग्निः १ ॥ १३ ॥ इ॒ष्टं च॒ वा ए॒ष पू॒र्तं च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वो॒ऽतिथे॑र॒श्नाति॑ २ ॥ १४ ॥ —अथर्व० का० ९ । सू० ६ ॥ *तस्यैवं विदुषो यज्ञस्यात्मा यजमानः श्रद्धा पत्नी शरीरमिध्ममुरो वेदिर्लोमानि बर्हिर्वेदः शिखा हृदयं यूपः काम १. (यः) जो (अतिथीनाम्) अतिथि अर्थात् उत्तम संन्यासियों का सङ्ग है (सः) वह संन्यासी के लिए (आहवनीयः) आहवनीय अग्नि, अर्थात् जिसमें ब्रह्मचर्याश्रम में ब्रह्मचारी होम करता है, और (यः) जो संन्यासी का (वेश्मनि) घर में अर्थात् स्थान में निवास है (सः) वह उसके लिए (गार्हपत्यः) गृहस्थ सम्बन्धी अग्नि है, और संन्यासी (यस्मिन्) जिस जाठराग्नि में अन्नादि को (पचन्ति) पकाते हैं (सः) वह (दक्षिणाग्निः) वानप्रस्थ सम्बन्धी अग्नि है, इस प्रकार आत्मा में सब अग्नियों का आरोपण करे ॥ १३ ॥ २. (यः) जो गृहस्थ (अतिथेः) संन्यासी से (पूर्वः) प्रथम (अश्नाति) भोजन करता है (एषः) वह जानो (गृहाणाम्) गृहस्थों के (इष्टम्) इष्ट सुख (च) और उसकी सामग्री (पूर्तम्) तथा जो ऐश्वर्यादि की पूर्णता (च) और उसके साधनों का (वै) निश्चय करके (अश्नाति) भक्षण अर्थात् नाश करता है। इसलिए जिस गृहस्थ के समीप अतिथि उपस्थित होवे उसको पूर्व जिमाकर पश्चात् भोजन करना अत्युचित है ॥ १४ ॥
- इसके आगे तैत्तिरीय आरण्यक का अर्थ करते हैं—(एवम्) इस प्रकार संन्यास ग्रहण किये हुए (तस्य) उस (विदुषः) विद्वान् संन्यासी के संन्यासाश्रमरूप (यज्ञस्य) अच्छे प्रकार अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ का (यजमानः) पति (आत्मा) स्वस्वरूप है, और जो ईश्वर, वेद और सत्यधर्माचरण, परोपकार में (श्रद्धा) सत्य