संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
संन्यासप्रकरणम् २८७ योऽति॒थीनां॒ स आ॑हव॒नीयो॒ यो वेश्म॑नि॒ स गार्ह॑पत्यो॒ यस्मि॒न् पच॑न्ति॒ स दक्षि॑णा॒ग्निः १ ॥ १३ ॥ इ॒ष्टं च॒ वा ए॒ष पू॒र्तं च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वो॒ऽतिथे॑र॒श्नाति॑ २ ॥ १४ ॥ —अथर्व० का० ९ । सू० ६ ॥ *तस्यैवं विदुषो यज्ञस्यात्मा यजमानः श्रद्धा पत्नी शरीरमिध्ममुरो वेदिर्लोमानि बर्हिर्वेदः शिखा हृदयं यूपः काम १. (यः) जो (अतिथीनाम्) अतिथि अर्थात् उत्तम संन्यासियों का सङ्ग है (सः) वह संन्यासी के लिए (आहवनीयः) आहवनीय अग्नि, अर्थात् जिसमें ब्रह्मचर्याश्रम में ब्रह्मचारी होम करता है, और (यः) जो संन्यासी का (वेश्मनि) घर में अर्थात् स्थान में निवास है (सः) वह उसके लिए (गार्हपत्यः) गृहस्थ सम्बन्धी अग्नि है, और संन्यासी (यस्मिन्) जिस जाठराग्नि में अन्नादि को (पचन्ति) पकाते हैं (सः) वह (दक्षिणाग्निः) वानप्रस्थ सम्बन्धी अग्नि है, इस प्रकार आत्मा में सब अग्नियों का आरोपण करे ॥ १३ ॥ २. (यः) जो गृहस्थ (अतिथेः) संन्यासी से (पूर्वः) प्रथम (अश्नाति) भोजन करता है (एषः) वह जानो (गृहाणाम्) गृहस्थों के (इष्टम्) इष्ट सुख (च) और उसकी सामग्री (पूर्तम्) तथा जो ऐश्वर्यादि की पूर्णता (च) और उसके साधनों का (वै) निश्चय करके (अश्नाति) भक्षण अर्थात् नाश करता है। इसलिए जिस गृहस्थ के समीप अतिथि उपस्थित होवे उसको पूर्व जिमाकर पश्चात् भोजन करना अत्युचित है ॥ १४ ॥
- इसके आगे तैत्तिरीय आरण्यक का अर्थ करते हैं—(एवम्) इस प्रकार संन्यास ग्रहण किये हुए (तस्य) उस (विदुषः) विद्वान् संन्यासी के संन्यासाश्रमरूप (यज्ञस्य) अच्छे प्रकार अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ का (यजमानः) पति (आत्मा) स्वस्वरूप है, और जो ईश्वर, वेद और सत्यधर्माचरण, परोपकार में (श्रद्धा) सत्य
२८८ संस्कारविधिः आज्यं मन्युः पशुस्तपोऽग्निर्दमः शमयिता दक्षिणा वाग्घोता प्राण उद्गाता चक्षुरध्वर्युर्मनो ब्रह्मा श्रोत्रमग्नीत्। यावद् ध्रियते सा दीक्षा यदश्नाति तद्धविर्यत्पिबति तदस्य सोमपानम्। यद्रमते तदुपसदो यत्सञ्चरत्युपविशत्युत्तिष्ठते च स प्रवर्ग्यो यन्मुखम् तदाहवनीयो या व्याहृतिराहुतिर्यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति यत्सायं प्रातरत्ति तत्समिधं यत्प्रातर्मध्यन्दिनꣲ का धारणरूप दृढ़ प्रीति है वह उसकी (पत्नी) स्त्री है, और जो संन्यासी का (शरीरम्) शरीर है वह (इध्मम्) यज्ञ के लिए इन्धन है, और जो उसका (उरः) वक्षःस्थल है वह (वेदिः) कुण्ड, और जो उसके शरीर पर (लोमानि) रोम हैं वे (बर्हिः) कुशा हैं, और जो (वेदः) वेद और उनका शब्दार्थसम्बन्ध जानकर आचरण करना है वह संन्यासी की (शिखा) चोटी है, और जो संन्यासी का (हृदयम्) हृदय है वह (यूपः) यज्ञ का स्तम्भ है, और जो इसके शरीर में (कामः) काम है वह (आज्यम्) ज्ञान- अग्नि में होम करने का पदार्थ है, और जो (मन्युः) संन्यासी में क्रोध है वह (पशुः) निवृत्त करने अर्थात् शरीर के मलवत् छोड़ने के योग्य है, और जो संन्यासी (तपः) सत्यधर्मानुष्ठान प्राणायामादि योगाभ्यास करता है वह (अग्निः) जानो वेदी का अग्नि है, जो संन्यासी (दमः) अधर्माचरण से इन्द्रियों को रोकके धर्माचरण में स्थिर रखके चलाता है वह (शमयिता) जानो दुष्टों को दण्ड देनेवाला सभ्य है, और जो संन्यासी की (वाक्) सत्योपदेश करने के लिए वाणी है वह जानो सब मनुष्यों को (दक्षिणा) अभयदान देना है। जो संन्यासी के शरीर में (प्राणः) प्राण है वह (होता) होता के समान, जो (चक्षुः) चक्षु है वह (उद्गाता) उद्गाता के तुल्य, जो (मनः) मन है वह (अध्वर्युः) अध्वर्यु के समान जो (श्रोत्रम्) श्रोत्र है वह (ब्रह्मा) ब्रह्मा और (अग्नीत्) अग्नि लानेवाले के तुल्य, (यावत् ध्रियते) जितना कुछ संन्यासी धारण करता है (सा)
संन्यासप्रकरणम् २८९ सायं च तानि सवनानि। ये अहोरात्रे ते दर्शपूर्णमासौ येऽर्द्धमासाश्च सामाश्च ते चातुर्मास्यानि य ऋतवस्ते पशुबन्धा ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च तेऽहर्गणाः सर्ववेदसं वा एतत्सतं यन्मरणं तदवभृथः। एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रᳲ सत्त्रं य एवं वह (दीक्षा) दीक्षाग्रहण, और (यत्) जो संन्यासी (अश्नाति) खाता है (तद्धविः) वह घृतादि साकल्य के समान, (यत् पिबति) और जो वह जल, दुग्धादि पीता है (तदस्य सोमपानम्) वह इसका सोमपान है, और (यद्रमते) वह जो इधर-उधर भ्रमण करता है (तदुपसदः) वह उपसद उपसामग्री, (यत्संचरत्युपविशत्युत्तिष्ठते च) जो वह गमन करता, बैठता और उठता है (स प्रवर्ग्यः) वह इसका प्रवर्ग्य है, (यन्मुखम्) जो इसका मुख है (तदाहवनीयः) वह संन्यासी को आहवनीय अग्नि के समान, (या व्याहृतिराहुतिर्यदस्य विज्ञानम्) जो संन्यासी का व्याहृति का उच्चारण करना वा जो इसका विज्ञान आहुतिरूप है (तज्जुहोति) वह जानो होम कर रहा है, (यत्सायं प्रातरत्ति) संन्यासी जो सायं और प्रातःकाल भोजन करता है (तत्समिधम्) वे समिधा हैं, (यत्प्रातर्मध्यन्दिनᳲ सायं च) जो संन्यासी प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में कर्म करता है (तानि सवनानि) वे तीन सवन, (ये अहोरात्रे) जो दिन और रात्रि हैं (ते दर्शपूर्णमासौ) वे संन्यासी के पौर्णमासेष्टि और अमावास्येष्टि हैं, (येऽर्धमासाश्च, मासाश्च) जो कृष्ण शुक्लपक्ष और महीने हैं (ते चातुर्मास्यानि) वे संन्यासी के चातुर्मास्य याग हैं, (ये ऋतवः) जो वसन्तादि ऋतु हैं (ये पशुबन्धाः) वे जानो संन्यासी के पशुबन्ध अर्थात् ६ पशुओं का बाँधे रखना है, (ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च) जो संवत्सर और परिवत्सर अर्थात् वर्ष-वर्षान्तर हैं (तेऽहर्गणाः) वे संन्यासी के अहर्गण—दो रात्रि वा तीन रात्रि आदि के व्रत हैं, जो (सर्ववेदसं वै) सर्वस्व दक्षिणा अर्थात् शिखा-सूत्र यज्ञोपवीत आदि पूर्वाश्रमचिह्नों का त्याग करना है (एतत्सत्रम्) वह सबसे
२९० संस्कारविधिः विद्वानुदगयने प्रमीयते देवानामेव महिमानं गत्वादित्यस्य सायुज्यं गच्छत्यथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितॄणामेव महिमानं गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं सलोकतामाप्नोत्येतौ वै सूर्या- चन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमित्युपनिषत् ॥ —तैत्ति० आ० प्रपा १० । अनु० ६४ ॥ अथ संन्यासे पुनः प्रमाणानि— *न्यास इत्याहुर्मनीषिणो ब्रह्माणम्। ब्रह्मा विश्वः कतमः बड़ा यज्ञ है, (यन्मरणम्) जो संन्यासी का मृत्यु है (तदवभृथः) वह यज्ञान्तस्नान है, (एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रꣳ सत्रम्) यही जरावस्था और मृत्युपर्यन्त अर्थात् यावत् जीवन है तावत् सत्योपदेश योगाभ्यासादि संन्यास के धर्म का अनुष्ठान अग्निहोत्ररूप बड़ा दीर्घ यज्ञ है। (य एवं विद्वानुदगयने०) जो इस प्रकार विद्वान् संन्यास लेकर विज्ञान, योगाभ्यास करके शरीर छोड़ता है वह विद्वानों ही के महिमा को प्राप्त होकर स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा के सङ्ग को प्राप्त होता है, और जो योग-विज्ञान से रहित है सो सांसारिक दक्षिणायनरूप व्यवहार में मृत्यु को प्राप्त होता है। वह पुनः पुनः माता-पिताओं ही के महिमा को प्राप्त होकर चन्द्रलोक के समान वृद्धि-क्षय को प्राप्त होता है और जो इन दोनों के महिमाओं को विद्वान् ब्राह्मण अर्थात् संन्यासी जीत लेता है वह उससे परे परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर मुक्ति के समय-पर्यन्त मोक्ष-सुख को भोगता है।
- (न्यास इत्याहुर्मनीषिणः०) इस अनुवाक का अर्थ सुगम है इसलिए भावार्थ कहते हैं। न्यास अर्थात् जो संन्यास शब्द का अर्थ पूर्व कह आये, उस रीति से जो संन्यासी होता है वह परमात्मा का उपासक है। यह परमेश्वर सूर्यादि लोकों में व्याप्त और पूर्ण है कि जिसके प्रताप से सूर्य तपता है। उस तपने से वर्षा, वर्षा से ओषधी-वनस्पति की उत्पत्ति, उनसे अन्न, अन्न से प्राण, प्राण से
संन्यासप्रकरणम् २९१ स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सर इति। संवत्सरोऽसावादित्यो यऽएष आदित्ये पुरुषः स परमेष्ठी ब्रह्मात्मा। याभिरादित्यस् तपति रश्मिभिस्ताभिः पर्जन्यो वर्षति पर्जन्येनौषधि- वनस्पतयः प्रजायन्त ओषधिवनस्पतिभिरन्नं भवत्यन्नेन प्राणाः प्राणैर्बलं बलेन तपस्तपसा श्रद्धा श्रद्धया मेधा मेधया मनीषा मनीषया मनो मनसा शान्तिः शान्त्या चित्तं चित्तेन स्मृतिः स्मृत्या स्मारः स्मारेण विज्ञानं विज्ञानेनात्मानं वेदयति, तस्मादन्नं ददन्सर्वाण्येतानि ददात्यन्नात्प्राणा बल, बल से तप अर्थात् प्राणायाम योगाभ्यास, उससे श्रद्धा— सत्यधारण में प्रीति, उससे बुद्धि, बुद्धि से विचारशक्ति, उससे ज्ञान, ज्ञान से शान्ति, शान्ति से चेतनता, चित्त से स्मृति, स्मृति से पूर्वापर का ज्ञान, उससे विज्ञान और विज्ञान से आत्मा को संन्यासी, जानता और जनाता है। इसलिए अन्नदान श्रेष्ठ जिससे प्राण, बल, विज्ञानादि होते हैं। जो प्राणों का आत्मा, जिससे यह सर्वजगत् ओतप्रोत व्याप्त हो रहा है। वह सब जगत् का कर्त्ता, वही पूर्वकल्प और उत्तरकल्प में भी जगत् को बनाता है। उसके जानने की इच्छा से उसको जानकर हे संन्यासिन् ! तू पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त मत हो, किन्तु मुक्ति के पूर्ण सुख को प्राप्त हो। इसीलिए सब तपों का तप, सबसे पृथक् उत्तम संन्यास को कहते हैं। हे परमेश्वर ! जो तू सबमें वास करता हुआ विभु है, तू प्राण का प्राण, सबका सन्धान करनेहारा, विश्व का स्रष्टा, धर्त्ता, सूर्यादि को तेजदाता है। तू ही अग्नि से तेजस्वी, तू ही विद्यादाता, तू ही सूर्य का कर्त्ता, तू ही चन्द्रमा के प्रकाश का प्रकाशक है। वह सबसे बड़ा पूजनीय देव है। (ओम्) इस मन्त्र का मन से उच्चारण करके परमात्मा में आत्मा को युक्त करे। जो इस विद्वानों की ग्राह्य महोत्तम विद्या को उक्त प्रकार से जानता है, वह संन्यासी परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर आनन्द में रहता है।
२९२ संस्कारविधिः भवन्ति भूतानाम्। प्राणैर्मनो मनसश्च विज्ञानं विज्ञाना- दानन्दो ब्रह्मयोनिः। स वा एष पुरुषः पञ्चधा पञ्चात्मा येन सर्वमिदं प्रोतं पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च दिशश्चावान्तर- दिशश्च स वै सर्वमिदं जगत् स भूतः स भव्यं जिज्ञासक्लृप्त ऋतजा रयिष्ठाः श्रद्धा सत्यो महस्वांस्तमसो वरिष्ठात्। ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो मृत्युमुपयाहि विद्वान्। तस्मात् न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः। वसुरण्वो विभूरसि प्राणे त्वमसि संधाता ब्रह्मंस्त्वमसि विश्वसृत् तेजोदास्त्व- मस्यग्नेरसि वर्चोदास्त्वमसि सूर्यस्य द्युम्नोदास्त्वमसि चन्द्रमस उपयामगृहीतोसि ब्रह्मणे त्वा महसे। ओमित्यात्मानं युञ्जीत। एतद्वै महोपनिषदं देवानां गुह्यम्। य एवं वेद ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमा- नमित्युपनिषत्॥ —तैत्ति० आ० प्रपा० १०। अनु० ६३॥ संन्यासी का कर्त्तव्याऽकर्त्तव्य दृ॒ते दृꣳह॑ मा मि॒त्रस्य॑ मा॒ चक्षु॑षा॒ सर्वा॑णि भू॒तानि॒ समी॑क्षन्ताम्। मि॒त्रस्या॒हं चक्षु॑षा॒ सर्वा॑णि भू॒तानि॒ समी॑क्षे। मि॒त्रस्य॒ चक्षु॑षा समी॑क्षामहे॥ १॥ —यजुः० अ० ३६। मं० १८॥ अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्। यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॥ यस्तु॒ सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति। स॒र्व॒भू॒तेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति॥ ३॥ यस्मि॒न्त्सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मैवाभू॑द्विजान॒तः। तत्र॒ को मोहः॒ कः शोक॑ऽ एक॒त्वम॑नु॒पश्य॑तः॥ ४॥ —यजुः० अ० ४०। मं० १६, ६, ७॥
संन्यासप्रकरणम् २९३ परी॒त्य भू॒तानि॑ परी॒त्य लो॒कान् परी॒त्य॒ सर्वाः॑ प्र॒दिशो॒ दिश॑श्च। उ॒पस्थाय॑ प्रथम॒जामृत॒स्यात्मना॒त्मान॑म॒भि सं वि॑वेश ॥५॥ —यजुः० अ० ३२। मं० ११॥ ऋचो॒ अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न् यस्मि॑न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः। यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्विदुस्त इ॒मे समा॑सते ॥६॥ —ऋ० म० १। सूक्त १६४। मं० ३९॥ समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत्। न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥७॥ —कठवल्ली ॥ अर्थ—हे (दृते) सर्वदुःखविदारक परमात्मन् ! तू (मा) मुझे संन्यासमार्ग में (दृंह) बढ़ा। हे सर्वमित्र ! तू (मित्रस्य) सर्वसुहृद् आप्त पुरुष की (चक्षुषा) दृष्टि से (मा) मुझे सबका मित्र बना। जिससे (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणिमात्र मुझे मित्र की दृष्टि से (समीक्षन्ताम्) देखें और (अहम्) मैं (मित्रस्य) मित्र की (चक्षुषा) दृष्टि से (सर्वाणि भूतानि) सब जीवों को (समीक्षे) देखूँ। इस प्रकार आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग एक-दूसरे को (मित्रस्य चक्षुषा) सुहृद्भाव की दृष्टि से (समीक्षामहे) देखते रहें ॥ १ ॥ हे (अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूप, सब दुःखों के दाहक, (देव) सब सुखों के दाता परमेश्वर ! (विद्वान्) आप (राये) योग- विज्ञानरूप धन की प्राप्ति के लिए (सुपथा) वेदोक्त धर्ममार्ग से (अस्मान्) हमें (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्मों को (नय) अपनी कृपा से प्राप्त कीजिए और
२९४ संस्कारविधिः (अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिल, पक्षपातसहित (एनः) अपराध, पाप-कर्म को (युयोधि) दूर रखिए और इस अधर्माचरण से हमें सदा दूर रखिए। इसीलिए (ते) आप ही की (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार (नमउक्तिम्) नमस्कारपूर्वक प्रशंसा को नित्य (विधेम) किया करें॥२॥ (यः) जो संन्यासी (तु) पुनः (आत्मन्नेव) आत्मा में, अर्थात् परमेश्वर ही में तथा अपने आत्मा के तुल्य (सर्वाणि भूतानि) सम्पूर्ण जीव और जगत्स्थ पदार्थों को (अनुपश्यति) अनुकूलता से देखता है, (च) और (सर्वभूतेषु) सम्पूर्ण प्राणी- अप्राणियों में (आत्मानम्) परमात्मा को देखता है, (ततः) इस कारण वह किसी व्यवहार में (न विचिकित्सति) संशय को प्राप्त नहीं होता, अर्थात् परमेश्वर को सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वसाक्षी जानके अपने आत्मा के तुल्य सब प्राणिमात्र को हानि- लाभ सुख-दुःखादि व्यवस्था में देखे, वही उत्तम संन्यासधर्म को प्राप्त होता है॥३॥ (विजानतः) विज्ञानयुक्त संन्यासी का (यस्मिन्) जिस पक्षपातरहित धर्मयुक्त संन्यास में (सर्वाणि भूतानि) सब प्राणिमात्र को (आत्मैव) आत्मा ही के तुल्य जानना, अर्थात् जैसा अपना आत्मा अपने को प्रिय है, उसी प्रकार का निश्चय (अभूत्) होता है, (तत्र) उस संन्यासाश्रम में (एकत्वमनुपश्यतः) आत्मा के एकभाव को देखनेवाले संन्यासी को (कः मोहः) कौन- सा मोह और (कः शोकः) कौन-सा शोक होता है? अर्थात् न उसको किसी से कभी मोह और न शोक होता है। इसलिए संन्यासी मोह-शोकादि दोषों से रहित होकर सदा सबका उपकार करता रहे॥४॥ इस प्रकार परमात्मा की स्तुति प्रार्थना और धर्म में दृढ़ निष्ठा करके जो (भूतानि) सम्पूर्ण पृथिव्यादि भूतों में (परीत्य)
संन्यासप्रकरणम् २९५ व्यास (लोकान्) सम्पूर्ण लोकों में (परीत्य) पूर्ण हो और (सर्वाः) सब (प्रदिशो दिशश्च) दिशां और उपदिशाओं में (परीत्य) व्यापक होके स्थित है, (ऋतस्य) सत्यकारण के योग से (प्रथमजाम्) सब महत्तत्वादि सृष्टि को धारण करके पालन कर रहा है, उस (आत्मानम्) परमात्मा को संन्यासी (आत्मना) स्वात्मा से (उपस्थाय) समीप स्थित होकर उसमें (अभिसंविवेश) प्रतिदिन समाधियोग से प्रवेश किया करे॥५॥ हे संन्यासी लोगो! (यस्मिन्) जिस (परमे) सर्वोत्तम (व्योमन्) आकाशवत् व्यापक (अक्षरे) नाशरहित परमात्मा में (ऋचः) ऋग्वेदादि वेद और (विश्वे) सब (देवाः) पृथिव्यादि लोक और समस्त विद्वान् (अधिनिषेदुः) स्थित हुए और होते हैं, (यः) जो जन (तत्) उस व्यापक परमात्मा को (न वेद) नहीं जानता वह (ऋचा) वेदादि शास्त्र पढ़ने से (किं करिष्यति) क्या सुख वा लाभ कर लेगा? अर्थात् विद्या के बिना परमेश्वर का ज्ञान कभी नहीं होता और विद्या पढ़के भी जो परमेश्वर को नहीं जानता और न उसकी आज्ञा में चलता है वह मनुष्य- शरीर धारण करके निष्फल चला जाता है और (ये) जो विद्वान् लोग (तत्) उस ब्रह्म को (विदुः) जानते हैं। (ते इमे इत्) वे ये ही उस परमात्मा में (समासते) अच्छे प्रकार समाधियोग से स्थिर होते हैं॥६॥ (समाधिनिर्धूतमलस्य) समाधियोग से निर्मल (चेतसः) चित्त के सम्बन्ध से (आत्मनि) परमात्मा में (निवेशितस्य) निश्चल प्रवेश कराये हुए जीव को (यत्) जो (सुखम्) सुख (भवेत्) होवे, वह (गिरा) वाणी से (वर्णयितुम् न शक्यते) कहा नहीं जा सकता, क्योंकि (तदा) तब वह समाधि में स्वयं स्थित जीवात्मा (तत्) उस ब्रह्म को (अन्तःकरणेन) शुद्ध अन्तःकरण से (गृह्यते) ग्रहण करता है, वह वर्णन करने में
२९६ संस्कारविधिः पूर्णरीति से कभी नहीं आ सकता। इसलिए संन्यासी लोग परमात्मा में स्थित रहे और उसकी आज्ञा, अर्थात् पक्षपात- रहित न्यायधर्म में स्थित होकर सत्योपदेश, सत्यविद्या के प्रचार से सब मनुष्यों को सुख पहुँचाता रहे॥७॥ संमानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव। अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥१॥ यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः। यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्॥२॥ अर्थ—संन्यासी जगत् के सन्मान से विष के तुल्य डरता रहे और अमृत के समान अपमान की चाहना करता रहे, क्योंकि जो अपमान से डरता और मान की इच्छा करता है, वह प्रशंसित होकर मिथ्यावादी और पतित हो जाता है। इसलिए चाहे निन्दा चाहे प्रशंसा, चाहे मान्य चाहे अपमान, चाहे जीना चाहे मृत्यु, चाहे हानि चाहे लाभ हो, चाहे कोई प्रीति करे चाहे वैर बाँधे, चाहे अन्न, पान, वस्त्र, उत्तम स्थान न मिले वा मिले, चाहे शीत-उष्ण कितना ही क्यों न हो इत्यादि सबका सहन करे और अधर्म का खण्डन तथा धर्म का मण्डन सदा करता रहे। इससे परे उत्तम धर्म दूसरा किसी को न माने। परमेश्वर से भिन्न किसी की उपासना न करे। न वेदविरुद्ध कुछ माने। परमेश्वर के स्थान में सूक्ष्म वा स्थूल तथा जड़ और जीव को भी कभी न माने। परमेश्वर को सदा अपना स्वामी माने और आप सेवक बना रहे। वैसा ही उपदेश अन्य को भी किया करे। जिस-जिस कर्म से गृहस्थों की उन्नति हो वा माता, पिता, पुत्र, स्त्री, पति, बन्धु, बहिन, मित्र, पड़ोसी, नौकर, बड़े और छोटों में विरोध छूटकर प्रेम बढ़े, उस-उसका उपदेश करे। जो वेद से विरुद्ध मत-मतान्तर के ग्रन्थ बायबल, कुरान, पुराण, मिथ्याभिलाप तथा काव्यालङ्कार कि जिनके पढ़ने-सुनने
अन्त्येष्टिप्रकरणम् २९७ से मनुष्य विषयी और पतित हो जाते हैं, उन सबका निषेध करता रहे। विद्वानों और परमेश्वर से भिन्न न किसी को देव तथा विद्या, योगाभ्यास, सत्सङ्ग और सत्यभाषणादि से भिन्न न किसी को तीर्थ और विद्वानों की मूर्त्तियों से भिन्न पाषाणादि मूर्त्तियों को न माने, न मनवावे। वैसे ही गृहस्थों को चाहिए कि माता, पिता, आचार्य, अतिथि, स्त्री के लिए विवाहित पुरुष ओर पुरुष के लिए विवाहित स्त्री की मूर्त्ति से भिन्न किसी की मूर्त्ति को पूज्य न समझे, न समझावे, किन्तु वैदिक मत की उन्नति और वेदविरुद्ध पाखण्डमतों के खण्डन करने में सदा तत्पर रहे। वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा और तद्विरुद्ध ग्रन्थों वा मतों में अश्रद्धा किया-कराया करे। आप शुभ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त होकर सबको इसी प्रकार का करने में प्रयत्न किया करे और जो पूर्वोक्त उपदेश लिखे हैं, उन-उन अपने संन्यासाश्रम के कर्त्तव्य कर्मों को किया करे। खण्डनीय कर्मों का खण्डन करना कभी न छोड़े। आसुर, अर्थात् अपने को ईश्वर, ब्रह्म माननेवालों का भी यथावत् खण्डन करता रहे। परमेश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव और न्याय आदि गुणों का प्रकाश करता रहे। इस प्रकार कर्म करता हुआ स्वयं आनन्द में रहकर सबको आनन्द में रक्खे। सर्वदा (अहिंसा) निर्वैरता, (सत्यम्) सत्य बोलना, सत्य मानना, सत्य करना, (अस्तेयम्) मन-कर्म-वचन से अन्याय करके पर-पदार्थ का ग्रहण न करना चाहिए, न किसी को करने का उपदेश करे। (ब्रह्मचर्यम्) सदा जितेन्द्रिय होकर अष्टविध मैथुन का त्याग रखके वीर्य की रक्षा और उन्नति करके चिरञ्जीवी होकर सबका उपकार करता रहे। (अपरिग्रहः) अभिमानादि दोषरहित, किसी संसार के धनादि पदार्थों में मोहित होकर कभी न फँसे। इन पाँच यमों का सेवन सदा किया करे
२९८ संस्कारविधिः और इनके साथ पाँच नियम, अर्थात् (शौच) बाहर-भीतर से पवित्र रहना, (सन्तोष) पुरुषार्थ करते जाना और हानि-लाभ में प्रसन्न और अप्रसन्न न होना। (तपः) सदा पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म का सेवन प्राणायामादि, योगाभ्यास करना, (स्वाध्याय) सदा प्रणव का जप, अर्थात् मन में चिन्तन और उसके अर्थ ईश्वर का विचार करते रहना। (ईश्वरप्रणिधान), अर्थात् अपने आत्मा को वेदोक्त परमेश्वर की आज्ञा में समर्पित करके जीते हुए परमानन्द परमेश्वर के सुख को भोगकर शरीर छोड़के सर्वानन्दयुक्त मोक्ष को प्राप्त होना संन्यासियों के मुख्य कर्म हैं। हे जगदीश्वर ! सर्वशक्तिमन्, सर्वान्तर्यामिन्, दयालो, न्यायकारिन्, सच्चिदानन्द, अनन्त, नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, अजर, अमर, पवित्र, परमात्मन् ! आप अपनी कृपा से संन्यासियों को पूर्वोक्त कर्मों में प्रवृत्त रखके परममुक्ति-सुख को प्राप्त कराते रहिए॥ ॥ इति संन्याससंस्कारविधिः समाप्तः ॥
अथान्त्येष्टिकर्मविधिं वक्ष्यामः 'अन्त्येष्टि' कर्म उसे कहते हैं कि जो शरीर के अन्त का संस्कार है। जिसके आगे उस शरीर के लिए कोई भी अन्य संस्कार नहीं है। इसी को नरमेध, पुरुषमेध, नरयाग, पुरुषयाग भी कहते हैं। भस्मा॑न्त॒ꣳ शरी॑रम्। —यजुः० अ० ४० । मं० १५ ॥ निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ॥ —मनु० अर्थः—शरीर का संस्कार (भस्मान्तम्), अर्थात् भस्म करने पर्यन्त है ॥ १ ॥ शरीर का आरम्भ ऋतुदान और अन्त में श्मशान, अर्थात् मृतक कर्म है ॥ २ ॥ प्रश्न—गरुड़पुराण आदि में दशगात्र, एकादशाह, द्वादशाह, सपिण्डी कर्म, मासिक, वार्षिक, गयाश्राद्ध आदि क्रिया लिखी हैं क्या ये सब असत्य हैं? उत्तर—हाँ, अवश्य मिथ्या हैं, क्योंकि वेदों में इन कर्मों का विधान नहीं है, इसलिए अकर्त्तव्य हैं और मृतक जीव का सम्बन्ध पूर्व सम्बन्धियों के साथ कुछ भी नहीं रहता और न इन जीते हुए सम्बन्धियों का। वह जीव.अपने कर्म के अनुसार जन्म पाता है। प्रश्न—मरण के पीछे जीव कहाँ जाता है! उत्तर—यमालय को। प्रश्न—यमालय किसको कहते हैं? उत्तर—वाय्वालय को।
३०० संस्कारविधिः प्रश्न—वाय्वालय किसको कहते हैं? उत्तर—अन्तरिक्ष को, जोकि यह पोल है। प्रश्न—क्या गरुड़पुराण आदि में जो यमलोक लिखा है वह झूठा है? उत्तर—अवश्य मिथ्या है। प्रश्न—पुनः संसार क्यों मानता है? उत्तर—वेद के [विषय में] अज्ञान और वेद-उपदेश के न होने से। जो यम की कथा लिख रक्खी है वह सब मिथ्या है, क्योंकि 'यम' इतने पदार्थों का नाम है— षळिद् य॒मा ऋष॑यो दे॒व॒जा इति॑ ॥ १ ॥ —ऋ० म० १। सू० १६४। मं० १५ ॥ शके॑म वा॒जिनो॒ यम॑म् ॥ २ ॥ —ऋ० म० २। सू० ५। मं० १ ॥ य॒माय॑ जुहुता ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो अरं॑कृतः ॥ ३ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १४। मं० १३ ॥ य॒मः सूयमा॑नो॒ विष्णु॑ः स॒म्भ्रियमा॑णो वा॒युः पू॒यमा॑नः ॥ ४ ॥ —यजुः० अ० ८। मं० ५७ ॥ वा॒जिनं॑ य॒मम् ॥ ५ ॥ —ऋ० म० ८। सू० २४। मं० २२ ॥ य॒मं मा॑त॒रिश्वान॑माहुः ॥ ६ ॥ —ऋ० म० १। सू० १६४। मं० ४६ ॥ अर्थ—यहाँ ऋतुओं का यम नाम है ॥ १ ॥ यहाँ परमेश्वर का नाम है ॥ २ ॥ यहाँ अग्नि का नाम है ॥ ३ ॥ यहाँ वायु, विद्युत्, सूर्य के यम नाम हैं ॥ ४ ॥ यहाँ भी वेगवाला होने से वायु का नाम यम है ॥ ५ ॥
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०१ यहाँ परमेश्वर का नाम यम है॥६॥ इत्यादि पदार्थों का नाम ‘यम’ है। इसलिए पुराण आदि की सब कल्पना झूठी है। विधि— संस्थिते भूमिभागं खानयेद् दक्षिणपूर्वस्यां दिशि दक्षिणापरस्यां वा॥१॥ दक्षिणाप्रवणं प्राग्दक्षिणाप्रवणं वा प्रत्यग्दक्षिणा- प्रवणमित्येके॥२॥ यावानुद् बाहुकः पुरुषस्तावदायामम्॥३॥ व्याममात्रं तिर्यक्॥४॥ वितस्त्यर्वाक् ॥५॥ केशश्मश्रुलोमनखानीत्युक्तं पुरस्तात्॥६॥ द्विगुल्फं बर्हिराज्यं च॥७॥ दध्यन्यत्र सर्पिरानयन्त्येतत् पित्र्यं पृषदाज्यम्॥८॥ अथैतां दिशमग्नीन् नयन्ति यज्ञपात्राणि च॥९॥ अर्थ—जब कोई मर जावे तब यदि पुरुष हो तो पुरुष और स्त्री हो तो स्त्रियाँ उसे स्नान करावें। चन्दनादि सुगन्धलेपन और नवीन वस्त्र धारण करावें। जितना उसके शरीर का भार हो उतना घृत, यदि अधिक सामर्थ्य हो तो अधिक लेवें और जो महादरिद्र, भिक्षुक हो कि जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसे कोई श्रीमान् वा पञ्च बनके अध मन से कम घी न देवें, और श्रीमान् लोग शरीर के बराबर तोलके चन्दन, सेरभर घी में एक रत्ती कस्तूरी, एक मासा केसर, एक-एक मण घी के साथ सेर-सेरभर अगर-तगर और घृत में चन्दन का चूरा भी यथाशक्ति डाल कपूर, पलाश आदि के पूर्ण काष्ठ, शरीर के भार से दूनी सामग्री शमशान में पहुँचावें। तत्पश्चात् मृतक को वहाँ शमशान में ले-जाएँ।
३०२ संस्कारविधिः यदि प्राचीन वेदी बनी हुई न हो तो नवीन वेदी भूमि में खोदे। वह श्मशान का स्थान बस्ती से दक्षिण तथा आग्नेय, अथवा नैर्ऋत्य कोण में हो, वहाँ भूमि को खोदे। मृतक के पग दक्षिण, नैर्ऋत्य, अथवा आग्नेय कोण में रहें। शिर उत्तर, ईशान वा वायव्य कोण में रहे॥ १॥ मृतक के पग की ओर वेदी के तले में नीचा और शिर की ओर थोड़ा ऊँचा रहे॥ २॥ उस वेदी का परिमाण पुरुष खड़ा होकर ऊपर को हाथ उठावे उतनी लम्बी और दोनों हाथों को लम्बे उत्तर दक्षिण पार्श्व में करने से जितना परिमाण हो, अर्थात् मृतक् के साढ़े तीन हाथ, अथवा तीन हाथ ऊपर से चौड़ी होवे और छाती के बराबर गहरी होवे॥ ३॥ और नीचे आध हाथ, अर्थात् एक बीताभर रहे॥ ४॥ उस वेदी में थोड़ा-थोड़ा जल छिटकावे, यदि गोमय उपस्थित हो तो लेपन भी करदे। उसमें नीचे से आधी वेदी तक लकड़ियाँ चिने जैसेकि भित्ती में ईंटें चिनी जाती हैं, अर्थात् बराबर जमाकर लकड़ियाँ धरे। लकड़ियों के बीच में थोड़ा- थोड़ा कपूर थोड़ी-थोड़ी दूर पर रक्खे। उसके ऊपर मध्य में मृतक को रक्खे, अर्थात् चारों ओर वेदी बराबर खाली रहे और पश्चात् चारों ओर ऊपर चन्दन तथा पलाश आदि के काष्ठ बराबर चिने। वेदी से ऊपर एक बीताभर लकड़ियाँ चिने। जबतक यह क्रिया होवे, तबतक अलग चूल्हा बना, अग्नि जला, घी तपा और छानकर पात्रों में रक्खे। उसमें कस्तूरी आदि सब पदार्थ मिलावे। लम्बी-लम्बी लकड़ियों में चार चमसों को चाहे वे लकड़ी के हों वा चाँदी, सोने के अथवा लोहे के हों, जिस चमसा में एक छटाँकभर से अधिक और आधी छटांकभर से न्यून घृत न आवे, खूब दृढ़ बन्धनों से दण्डों के
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०३ साथ बाँधे। पश्चात् घृत का दीपक करके कपूर में लगाकर शिर से आरम्भ कर पादपर्यन्त मध्य-मध्य में अग्नि-प्रवेश करावे। अग्नि-प्रवेश कराके— ॐ अग्नये स्वाहा ॥ ॐ सोमाय स्वाहा ॥ ॐ लोकाय स्वाहा ॥ ॐ अनुमतये स्वाहा ॥ ॐ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ॥ इन पाँच मन्त्रों से आहुतियाँ देके अग्नि को प्रदीप्त होने देवे। तत्पश्चात् चार मनुष्य पृथक्-पृथक् खड़े रहकर वेदों के मन्त्रों से आहुति देते जाएँ। जहाँ ‘स्वाहा' आवे वहाँ आहुति छोड़ देवें। अथ वेदमन्त्राः सूर्यं चक्षु॑र्गच्छतु॒ वात॑मा॒त्मा द्यां च॑ गच्छ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑णा। अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा शरी॑रैः स्वाहा॑ ॥ १ ॥ अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒ तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु॒ लो॒कं स्वाहा॑ ॥ २ ॥ अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑त॒श्चर॑ति स्व॒धाभि॑ः। आयुर्वसा॑न॒ उप॑वेतु॒ शेष॒ः सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ जातवेदः॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ अग्ने॒र्वर्म॒ परि॒ गोभि॑र्व्ययस्व॒ संप्रोर्णु॑ष्व॒ पीव॑सा॒ मेद॑सा च। नेत्त्वा॑ धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒ जहृ॑षाणो द॒धृग्वि॒धक्ष्यन्पर्य्यङ्ख्या॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ यं त्वम॑ग्ने॒ समद॑ह॒स्तमु॒ निर्वा॑पय॒ पुनः॑ । कि॒याम्ब्वत्र॒ रोह॑तु पाक॒दूर्वा व्य॑ल्क॒शा स्वाहा॑ ॥ ५ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १६। मं० ३-५, ७, १३॥
३०४ संस्कारविधिः परेयि॒वांसं॑ प्र॒वतो॑ म॒हीरनु॑ ब॒हुभ्यः॑ पन्था॑मनुपस्पशा॒नम्। वै॒व॒स्व॒तं सं॒गम॑नं॒ जना॑नां य॒मं राजा॑नं ह॒विषा॑ दुवस्य॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ य॒मो नो गा॒तुं प्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्तवा उ॑। यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परेयु॒रेना॑ जज्ञा॒नाः प॒थ्या॒३॒॑अनु॒ स्वाः स्वाहा॑ ॥ ७ ॥ मात॑ली क॒व्यैर्य॒मो अङ्गि॑रोभि॒र्बृह॒स्पति॒र्ऋक्व॑भिर्वावृधा॒नः। याँश्च॑ दे॒वा वा॑वृधु॒र्ये च॑ दे॒वान्त्स्वाहा॒न्ये स्व॒धया॒न्ये म॑द॒न्ति स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ इमं॑ यम प्रस्तर॒मा हि सीदाङ्गिरोभिः॑ पि॒तृभिः॑ संविदा॒नः। आ त्वा॒ मन्त्राः॑ क॒विश॑स्ता वहन्त्वे॒ना रा॑जन् ह॒विषा॑ मादयस्व॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥ अङ्गि॑रोभि॒रा ग॑हि य॒ज्ञिये॑भि॒र्यम॑ वैरू॒परि॒ह मा॑दयस्व। वि॒वस्व॑न्तं हुवे॒ यः पि॒ता ते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिष्या नि॒षद्य॒ स्वाहा॑ ॥ १० ॥ प्रेहि॒प्रेहि॑ प॒थिभिः॑ पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परे॒युः। उ॒भा राजा॑ना स्व॒धया॒ मद॑न्ता य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वं स्वाहा॑ ॥ ११ ॥ सं ग॑च्छस्व पि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ प॒रमे व्यो॑मन्। हि॒त्वाया॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः स्वाहा॑ ॥ १२ ॥ अपे॑त॒ वी॑त॒ वि च॑ सर्पतातॊ॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन्। अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्य॑क्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै॒ स्वाहा॑ ॥ १३ ॥ य॒माय॒ सोमं॑ सुनुत य॒माय॑ जुहुता ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः॒ स्वाहा॑ ॥ १४ ॥ य॒माय॑ घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत। सं नो॑ दे॒वेष्वा य॑मद्दी॒र्घमायुः॒ प्र जी॒वसे॒ स्वाहा॑ ॥ १५ ॥
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०५ य॒माय॒ मधु॑मत्तमं॒ राजे॑ ह॒व्यं जु॑होतन। इ॒दं नम॒ ऋषि॑भ्यः पूर्व॒जेभ्यः॒ पूर्वे॑भ्यः पथि॒कृद्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १६ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १४॥ कृ॒ष्णः श्वे॒तौऽरु॑षो यामो अस्य ब्र॒ध्न ऋ॒ज्र उत॑ शो॒णो य॑श॒स्वान्। हिर॑ण्यरूपं॒ जनि॑ता जजान॒ स्वाहा॑ ॥ १७ ॥ —ऋ० म० १०। सू० २०। मं० ९॥ इन ऋग्वेद के मन्त्रों से चारों जने सत्रह आज्याहुति देकर, निम्नलिखित मन्त्रों से उसी प्रकार आहुति देवें— प्रा॒णेभ्यः॒ सार्धि॑पति॒केभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ पृ॒थि॒व्यै स्वाहा॑ ॥ २ ॥ अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ अ॒न्तरि॑क्षाय॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ५ ॥ दि॒वे स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ सूर्या॑य॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥ दिग्भ्यः स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑ ॥ ९ ॥ नक्ष॑त्रेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १० ॥ अ॒द्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ११ ॥ वरु॑णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १२ ॥ ना॒भ्यै स्वाहा॑ ॥ १३ ॥ पू॒ताय॒ स्वाहा॑ ॥ १४ ॥ वा॒चे स्वाहा॑ ॥ १५ ॥ प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १६ ॥ प्रा॒णाय॒ स्वाहा॑ ॥ १७ ॥ चक्षु॑षे स्वाहा॑ ॥ १८ ॥ चक्षु॑षे स्वाहा॑ ॥ १९ ॥ श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ २० ॥ श्रोत्रा॑य॒ स्वाहा॑ ॥ २१ ॥ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २२ ॥ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २३ ॥ त्व॒चे स्वाहा॑ ॥ २४ ॥ त्व॒चे स्वाहा॑ ॥ २५ ॥ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॑ ॥ २६ ॥ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॑ ॥ २७ ॥
३०६ संस्कारविधिः मे॒दोभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २८ ॥ मे॒दोभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ २९ ॥ माथ्ंसेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३० ॥ माथ्ंसेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३१ ॥ स्त्राव॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३२ ॥ स्त्राव॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३३ ॥ अ॒स्थिभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३४ ॥ अ॒स्थिभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३५ ॥ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३६ ॥ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३७ ॥ रेत॑से॒ स्वाहा॑ ॥ ३८ ॥ पा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ३९ ॥ आ॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४० ॥ प्रा॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४१ ॥ सं॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४२ ॥ वि॒या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४३ ॥ उ॒द्या॒साय॒ स्वाहा॑ ॥ ४४ ॥ शुचे॒ स्वाहा॑ ॥ ४५ ॥ शोच॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ४६ ॥ शोच॑मानाय॒ स्वाहा॑ ॥ ४७ ॥ शोका॑य॒ स्वाहा॑ ॥ ४८ ॥ तप॑से॒ स्वाहा॑ ॥ ४९ ॥ तप्य॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ५० ॥ तप्य॑मानाय॒ स्वाहा॑ ॥ ५१ ॥ तृ॒प्ताय॒ स्वाहा॑ ॥ ५२ ॥ घ॒र्माय॒ स्वाहा॑ ॥ ५३ ॥ निष्कृत्यै॒ स्वाहा॑ ॥ ५४ ॥ प्राय॑श्चित्यै॒ स्वाहा॑ ॥ ५५ ॥ भेष॒जाय॒ स्वाहा॑ ॥ ५६ ॥ य॒माय॒ स्वाहा॑ ॥ ५७ ॥ अ॒न्त॒काय॒ स्वाहा॑ ॥ ५८ ॥ मृ॒त्यवे॒ स्वाहा॑ ॥ ५९ ॥ ब्रह्म॑णे॒ स्वाहा॑ ॥ ६० ॥ ब्र॒ह्म॒हत्यायै॒ स्वाहा॑ ॥ ६१ ॥ विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ६२ ॥ द्यावा॑पृथि॒वीभ्याꣳ॒ स्वाहा॑ ॥ ६३ ॥ —यजुः० अ० ३९ ॥ इन तिरसठ मन्त्रों से ६३ आहुति पृथक्-पृथक् देके, निम्नलिखित मन्त्रों से आहुति देवें—