संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०३ साथ बाँधे। पश्चात् घृत का दीपक करके कपूर में लगाकर शिर से आरम्भ कर पादपर्यन्त मध्य-मध्य में अग्नि-प्रवेश करावे। अग्नि-प्रवेश कराके— ॐ अग्नये स्वाहा ॥ ॐ सोमाय स्वाहा ॥ ॐ लोकाय स्वाहा ॥ ॐ अनुमतये स्वाहा ॥ ॐ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा ॥ इन पाँच मन्त्रों से आहुतियाँ देके अग्नि को प्रदीप्त होने देवे। तत्पश्चात् चार मनुष्य पृथक्-पृथक् खड़े रहकर वेदों के मन्त्रों से आहुति देते जाएँ। जहाँ ‘स्वाहा' आवे वहाँ आहुति छोड़ देवें। अथ वेदमन्त्राः सूर्यं चक्षु॑र्गच्छतु॒ वात॑मा॒त्मा द्यां च॑ गच्छ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑णा। अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा शरी॑रैः स्वाहा॑ ॥ १ ॥ अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒ तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु॒ लो॒कं स्वाहा॑ ॥ २ ॥ अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑त॒श्चर॑ति स्व॒धाभि॑ः। आयुर्वसा॑न॒ उप॑वेतु॒ शेष॒ः सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ जातवेदः॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ अग्ने॒र्वर्म॒ परि॒ गोभि॑र्व्ययस्व॒ संप्रोर्णु॑ष्व॒ पीव॑सा॒ मेद॑सा च। नेत्त्वा॑ धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒ जहृ॑षाणो द॒धृग्वि॒धक्ष्यन्पर्य्यङ्ख्या॑ते॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ यं त्वम॑ग्ने॒ समद॑ह॒स्तमु॒ निर्वा॑पय॒ पुनः॑ । कि॒याम्ब्वत्र॒ रोह॑तु पाक॒दूर्वा व्य॑ल्क॒शा स्वाहा॑ ॥ ५ ॥ —ऋ० म० १०। सू० १६। मं० ३-५, ७, १३॥