संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ संस्कारविधिः यदि प्राचीन वेदी बनी हुई न हो तो नवीन वेदी भूमि में खोदे। वह श्मशान का स्थान बस्ती से दक्षिण तथा आग्नेय, अथवा नैर्ऋत्य कोण में हो, वहाँ भूमि को खोदे। मृतक के पग दक्षिण, नैर्ऋत्य, अथवा आग्नेय कोण में रहें। शिर उत्तर, ईशान वा वायव्य कोण में रहे॥ १॥ मृतक के पग की ओर वेदी के तले में नीचा और शिर की ओर थोड़ा ऊँचा रहे॥ २॥ उस वेदी का परिमाण पुरुष खड़ा होकर ऊपर को हाथ उठावे उतनी लम्बी और दोनों हाथों को लम्बे उत्तर दक्षिण पार्श्व में करने से जितना परिमाण हो, अर्थात् मृतक् के साढ़े तीन हाथ, अथवा तीन हाथ ऊपर से चौड़ी होवे और छाती के बराबर गहरी होवे॥ ३॥ और नीचे आध हाथ, अर्थात् एक बीताभर रहे॥ ४॥ उस वेदी में थोड़ा-थोड़ा जल छिटकावे, यदि गोमय उपस्थित हो तो लेपन भी करदे। उसमें नीचे से आधी वेदी तक लकड़ियाँ चिने जैसेकि भित्ती में ईंटें चिनी जाती हैं, अर्थात् बराबर जमाकर लकड़ियाँ धरे। लकड़ियों के बीच में थोड़ा- थोड़ा कपूर थोड़ी-थोड़ी दूर पर रक्खे। उसके ऊपर मध्य में मृतक को रक्खे, अर्थात् चारों ओर वेदी बराबर खाली रहे और पश्चात् चारों ओर ऊपर चन्दन तथा पलाश आदि के काष्ठ बराबर चिने। वेदी से ऊपर एक बीताभर लकड़ियाँ चिने। जबतक यह क्रिया होवे, तबतक अलग चूल्हा बना, अग्नि जला, घी तपा और छानकर पात्रों में रक्खे। उसमें कस्तूरी आदि सब पदार्थ मिलावे। लम्बी-लम्बी लकड़ियों में चार चमसों को चाहे वे लकड़ी के हों वा चाँदी, सोने के अथवा लोहे के हों, जिस चमसा में एक छटाँकभर से अधिक और आधी छटांकभर से न्यून घृत न आवे, खूब दृढ़ बन्धनों से दण्डों के