संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०१ यहाँ परमेश्वर का नाम यम है॥६॥ इत्यादि पदार्थों का नाम ‘यम’ है। इसलिए पुराण आदि की सब कल्पना झूठी है। विधि— संस्थिते भूमिभागं खानयेद् दक्षिणपूर्वस्यां दिशि दक्षिणापरस्यां वा॥१॥ दक्षिणाप्रवणं प्राग्दक्षिणाप्रवणं वा प्रत्यग्दक्षिणा- प्रवणमित्येके॥२॥ यावानुद् बाहुकः पुरुषस्तावदायामम्॥३॥ व्याममात्रं तिर्यक्॥४॥ वितस्त्यर्वाक् ॥५॥ केशश्मश्रुलोमनखानीत्युक्तं पुरस्तात्॥६॥ द्विगुल्फं बर्हिराज्यं च॥७॥ दध्यन्यत्र सर्पिरानयन्त्येतत् पित्र्यं पृषदाज्यम्॥८॥ अथैतां दिशमग्नीन् नयन्ति यज्ञपात्राणि च॥९॥ अर्थ—जब कोई मर जावे तब यदि पुरुष हो तो पुरुष और स्त्री हो तो स्त्रियाँ उसे स्नान करावें। चन्दनादि सुगन्धलेपन और नवीन वस्त्र धारण करावें। जितना उसके शरीर का भार हो उतना घृत, यदि अधिक सामर्थ्य हो तो अधिक लेवें और जो महादरिद्र, भिक्षुक हो कि जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसे कोई श्रीमान् वा पञ्च बनके अध मन से कम घी न देवें, और श्रीमान् लोग शरीर के बराबर तोलके चन्दन, सेरभर घी में एक रत्ती कस्तूरी, एक मासा केसर, एक-एक मण घी के साथ सेर-सेरभर अगर-तगर और घृत में चन्दन का चूरा भी यथाशक्ति डाल कपूर, पलाश आदि के पूर्ण काष्ठ, शरीर के भार से दूनी सामग्री शमशान में पहुँचावें। तत्पश्चात् मृतक को वहाँ शमशान में ले-जाएँ।