संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २९१ स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सर इति। संवत्सरोऽसावादित्यो यऽएष आदित्ये पुरुषः स परमेष्ठी ब्रह्मात्मा। याभिरादित्यस् तपति रश्मिभिस्ताभिः पर्जन्यो वर्षति पर्जन्येनौषधि- वनस्पतयः प्रजायन्त ओषधिवनस्पतिभिरन्नं भवत्यन्नेन प्राणाः प्राणैर्बलं बलेन तपस्तपसा श्रद्धा श्रद्धया मेधा मेधया मनीषा मनीषया मनो मनसा शान्तिः शान्त्या चित्तं चित्तेन स्मृतिः स्मृत्या स्मारः स्मारेण विज्ञानं विज्ञानेनात्मानं वेदयति, तस्मादन्नं ददन्सर्वाण्येतानि ददात्यन्नात्प्राणा बल, बल से तप अर्थात् प्राणायाम योगाभ्यास, उससे श्रद्धा— सत्यधारण में प्रीति, उससे बुद्धि, बुद्धि से विचारशक्ति, उससे ज्ञान, ज्ञान से शान्ति, शान्ति से चेतनता, चित्त से स्मृति, स्मृति से पूर्वापर का ज्ञान, उससे विज्ञान और विज्ञान से आत्मा को संन्यासी, जानता और जनाता है। इसलिए अन्नदान श्रेष्ठ जिससे प्राण, बल, विज्ञानादि होते हैं। जो प्राणों का आत्मा, जिससे यह सर्वजगत् ओतप्रोत व्याप्त हो रहा है। वह सब जगत् का कर्त्ता, वही पूर्वकल्प और उत्तरकल्प में भी जगत् को बनाता है। उसके जानने की इच्छा से उसको जानकर हे संन्यासिन् ! तू पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त मत हो, किन्तु मुक्ति के पूर्ण सुख को प्राप्त हो। इसीलिए सब तपों का तप, सबसे पृथक् उत्तम संन्यास को कहते हैं। हे परमेश्वर ! जो तू सबमें वास करता हुआ विभु है, तू प्राण का प्राण, सबका सन्धान करनेहारा, विश्व का स्रष्टा, धर्त्ता, सूर्यादि को तेजदाता है। तू ही अग्नि से तेजस्वी, तू ही विद्यादाता, तू ही सूर्य का कर्त्ता, तू ही चन्द्रमा के प्रकाश का प्रकाशक है। वह सबसे बड़ा पूजनीय देव है। (ओम्) इस मन्त्र का मन से उच्चारण करके परमात्मा में आत्मा को युक्त करे। जो इस विद्वानों की ग्राह्य महोत्तम विद्या को उक्त प्रकार से जानता है, वह संन्यासी परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर आनन्द में रहता है।