संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० संस्कारविधिः विद्वानुदगयने प्रमीयते देवानामेव महिमानं गत्वादित्यस्य सायुज्यं गच्छत्यथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितॄणामेव महिमानं गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं सलोकतामाप्नोत्येतौ वै सूर्या- चन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमित्युपनिषत् ॥ —तैत्ति० आ० प्रपा १० । अनु० ६४ ॥ अथ संन्यासे पुनः प्रमाणानि— *न्यास इत्याहुर्मनीषिणो ब्रह्माणम्। ब्रह्मा विश्वः कतमः बड़ा यज्ञ है, (यन्मरणम्) जो संन्यासी का मृत्यु है (तदवभृथः) वह यज्ञान्तस्नान है, (एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रꣳ सत्रम्) यही जरावस्था और मृत्युपर्यन्त अर्थात् यावत् जीवन है तावत् सत्योपदेश योगाभ्यासादि संन्यास के धर्म का अनुष्ठान अग्निहोत्ररूप बड़ा दीर्घ यज्ञ है। (य एवं विद्वानुदगयने०) जो इस प्रकार विद्वान् संन्यास लेकर विज्ञान, योगाभ्यास करके शरीर छोड़ता है वह विद्वानों ही के महिमा को प्राप्त होकर स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा के सङ्ग को प्राप्त होता है, और जो योग-विज्ञान से रहित है सो सांसारिक दक्षिणायनरूप व्यवहार में मृत्यु को प्राप्त होता है। वह पुनः पुनः माता-पिताओं ही के महिमा को प्राप्त होकर चन्द्रलोक के समान वृद्धि-क्षय को प्राप्त होता है और जो इन दोनों के महिमाओं को विद्वान् ब्राह्मण अर्थात् संन्यासी जीत लेता है वह उससे परे परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर मुक्ति के समय-पर्यन्त मोक्ष-सुख को भोगता है।
- (न्यास इत्याहुर्मनीषिणः०) इस अनुवाक का अर्थ सुगम है इसलिए भावार्थ कहते हैं। न्यास अर्थात् जो संन्यास शब्द का अर्थ पूर्व कह आये, उस रीति से जो संन्यासी होता है वह परमात्मा का उपासक है। यह परमेश्वर सूर्यादि लोकों में व्याप्त और पूर्ण है कि जिसके प्रताप से सूर्य तपता है। उस तपने से वर्षा, वर्षा से ओषधी-वनस्पति की उत्पत्ति, उनसे अन्न, अन्न से प्राण, प्राण से