संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यासप्रकरणम् २८९ सायं च तानि सवनानि। ये अहोरात्रे ते दर्शपूर्णमासौ येऽर्द्धमासाश्च सामाश्च ते चातुर्मास्यानि य ऋतवस्ते पशुबन्धा ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च तेऽहर्गणाः सर्ववेदसं वा एतत्सतं यन्मरणं तदवभृथः। एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रᳲ सत्त्रं य एवं वह (दीक्षा) दीक्षाग्रहण, और (यत्) जो संन्यासी (अश्नाति) खाता है (तद्धविः) वह घृतादि साकल्य के समान, (यत् पिबति) और जो वह जल, दुग्धादि पीता है (तदस्य सोमपानम्) वह इसका सोमपान है, और (यद्रमते) वह जो इधर-उधर भ्रमण करता है (तदुपसदः) वह उपसद उपसामग्री, (यत्संचरत्युपविशत्युत्तिष्ठते च) जो वह गमन करता, बैठता और उठता है (स प्रवर्ग्यः) वह इसका प्रवर्ग्य है, (यन्मुखम्) जो इसका मुख है (तदाहवनीयः) वह संन्यासी को आहवनीय अग्नि के समान, (या व्याहृतिराहुतिर्यदस्य विज्ञानम्) जो संन्यासी का व्याहृति का उच्चारण करना वा जो इसका विज्ञान आहुतिरूप है (तज्जुहोति) वह जानो होम कर रहा है, (यत्सायं प्रातरत्ति) संन्यासी जो सायं और प्रातःकाल भोजन करता है (तत्समिधम्) वे समिधा हैं, (यत्प्रातर्मध्यन्दिनᳲ सायं च) जो संन्यासी प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में कर्म करता है (तानि सवनानि) वे तीन सवन, (ये अहोरात्रे) जो दिन और रात्रि हैं (ते दर्शपूर्णमासौ) वे संन्यासी के पौर्णमासेष्टि और अमावास्येष्टि हैं, (येऽर्धमासाश्च, मासाश्च) जो कृष्ण शुक्लपक्ष और महीने हैं (ते चातुर्मास्यानि) वे संन्यासी के चातुर्मास्य याग हैं, (ये ऋतवः) जो वसन्तादि ऋतु हैं (ये पशुबन्धाः) वे जानो संन्यासी के पशुबन्ध अर्थात् ६ पशुओं का बाँधे रखना है, (ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च) जो संवत्सर और परिवत्सर अर्थात् वर्ष-वर्षान्तर हैं (तेऽहर्गणाः) वे संन्यासी के अहर्गण—दो रात्रि वा तीन रात्रि आदि के व्रत हैं, जो (सर्ववेदसं वै) सर्वस्व दक्षिणा अर्थात् शिखा-सूत्र यज्ञोपवीत आदि पूर्वाश्रमचिह्नों का त्याग करना है (एतत्सत्रम्) वह सबसे