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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 318 में से

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पृष्ठ 303

अथान्त्येष्टिकर्मविधिं वक्ष्यामः 'अन्त्येष्टि' कर्म उसे कहते हैं कि जो शरीर के अन्त का संस्कार है। जिसके आगे उस शरीर के लिए कोई भी अन्य संस्कार नहीं है। इसी को नरमेध, पुरुषमेध, नरयाग, पुरुषयाग भी कहते हैं। भस्मा॑न्त॒ꣳ शरी॑रम्। —यजुः० अ० ४० । मं० १५ ॥ निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ॥ —मनु० अर्थः—शरीर का संस्कार (भस्मान्तम्), अर्थात् भस्म करने पर्यन्त है ॥ १ ॥ शरीर का आरम्भ ऋतुदान और अन्त में श्मशान, अर्थात् मृतक कर्म है ॥ २ ॥ प्रश्न—गरुड़पुराण आदि में दशगात्र, एकादशाह, द्वादशाह, सपिण्डी कर्म, मासिक, वार्षिक, गयाश्राद्ध आदि क्रिया लिखी हैं क्या ये सब असत्य हैं? उत्तर—हाँ, अवश्य मिथ्या हैं, क्योंकि वेदों में इन कर्मों का विधान नहीं है, इसलिए अकर्त्तव्य हैं और मृतक जीव का सम्बन्ध पूर्व सम्बन्धियों के साथ कुछ भी नहीं रहता और न इन जीते हुए सम्बन्धियों का। वह जीव.अपने कर्म के अनुसार जन्म पाता है। प्रश्न—मरण के पीछे जीव कहाँ जाता है! उत्तर—यमालय को। प्रश्न—यमालय किसको कहते हैं? उत्तर—वाय्वालय को।

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