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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 302

२९८ संस्कारविधिः और इनके साथ पाँच नियम, अर्थात् (शौच) बाहर-भीतर से पवित्र रहना, (सन्तोष) पुरुषार्थ करते जाना और हानि-लाभ में प्रसन्न और अप्रसन्न न होना। (तपः) सदा पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म का सेवन प्राणायामादि, योगाभ्यास करना, (स्वाध्याय) सदा प्रणव का जप, अर्थात् मन में चिन्तन और उसके अर्थ ईश्वर का विचार करते रहना। (ईश्वरप्रणिधान), अर्थात् अपने आत्मा को वेदोक्त परमेश्वर की आज्ञा में समर्पित करके जीते हुए परमानन्द परमेश्वर के सुख को भोगकर शरीर छोड़के सर्वानन्दयुक्त मोक्ष को प्राप्त होना संन्यासियों के मुख्य कर्म हैं। हे जगदीश्वर ! सर्वशक्तिमन्, सर्वान्तर्यामिन्, दयालो, न्यायकारिन्, सच्चिदानन्द, अनन्त, नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, अजर, अमर, पवित्र, परमात्मन् ! आप अपनी कृपा से संन्यासियों को पूर्वोक्त कर्मों में प्रवृत्त रखके परममुक्ति-सुख को प्राप्त कराते रहिए॥ ॥ इति संन्याससंस्कारविधिः समाप्तः ॥