संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्त्येष्टिप्रकरणम् २९७ से मनुष्य विषयी और पतित हो जाते हैं, उन सबका निषेध करता रहे। विद्वानों और परमेश्वर से भिन्न न किसी को देव तथा विद्या, योगाभ्यास, सत्सङ्ग और सत्यभाषणादि से भिन्न न किसी को तीर्थ और विद्वानों की मूर्त्तियों से भिन्न पाषाणादि मूर्त्तियों को न माने, न मनवावे। वैसे ही गृहस्थों को चाहिए कि माता, पिता, आचार्य, अतिथि, स्त्री के लिए विवाहित पुरुष ओर पुरुष के लिए विवाहित स्त्री की मूर्त्ति से भिन्न किसी की मूर्त्ति को पूज्य न समझे, न समझावे, किन्तु वैदिक मत की उन्नति और वेदविरुद्ध पाखण्डमतों के खण्डन करने में सदा तत्पर रहे। वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा और तद्विरुद्ध ग्रन्थों वा मतों में अश्रद्धा किया-कराया करे। आप शुभ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त होकर सबको इसी प्रकार का करने में प्रयत्न किया करे और जो पूर्वोक्त उपदेश लिखे हैं, उन-उन अपने संन्यासाश्रम के कर्त्तव्य कर्मों को किया करे। खण्डनीय कर्मों का खण्डन करना कभी न छोड़े। आसुर, अर्थात् अपने को ईश्वर, ब्रह्म माननेवालों का भी यथावत् खण्डन करता रहे। परमेश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव और न्याय आदि गुणों का प्रकाश करता रहे। इस प्रकार कर्म करता हुआ स्वयं आनन्द में रहकर सबको आनन्द में रक्खे। सर्वदा (अहिंसा) निर्वैरता, (सत्यम्) सत्य बोलना, सत्य मानना, सत्य करना, (अस्तेयम्) मन-कर्म-वचन से अन्याय करके पर-पदार्थ का ग्रहण न करना चाहिए, न किसी को करने का उपदेश करे। (ब्रह्मचर्यम्) सदा जितेन्द्रिय होकर अष्टविध मैथुन का त्याग रखके वीर्य की रक्षा और उन्नति करके चिरञ्जीवी होकर सबका उपकार करता रहे। (अपरिग्रहः) अभिमानादि दोषरहित, किसी संसार के धनादि पदार्थों में मोहित होकर कभी न फँसे। इन पाँच यमों का सेवन सदा किया करे