संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ संस्कारविधिः घृतादि शाकल्य, सामग्री एक दिन पूर्व कर रखनी। पश्चात् जिस दिन संन्यास लेना हो, प्रहर रात्रि से उठकर शौच, स्नानादि आवश्यक कर्म करके, प्राणायाम, ध्यान और प्रणव का जप करता रहे। सूर्योदय के समय उत्तम गृहस्थ धार्मिक विद्वानों का पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे वरण कर, पृ० १३-२१ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन-शान्तिकरण का पाठ कर, पृष्ठ ३० से पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, घृतप्रतपन और स्थालीपाक करके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर जलप्रोक्षण, आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, तथा— ओं भुवनपतये स्वाहा॥ ओं भूतानां पतये स्वाहा॥ ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इनमें से एक-एक मन्त्र से एक-एक करके ग्यारह आज्याहुति देके जो विधिपूर्वक भात बनाया हो उसमें घृत सेचन करके, यजमान जोकि संन्यास का लेनेवाला है और दो ऋत्विज् निम्नलिखित स्वाहान्त मन्त्रों से भात का होम और शेष दो ऋत्विज् भी साथ-साथ घृताहुति करते जावें— ओं ब्रह्म॒ होता॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञो ब्रह्म॑णा॒ स्वर॑वो मि॒ताः। अ॒ध्व॒र्युर्ब्रह्म॑णो जा॒तो ब्रह्म॑णो॒ऽन्तर्हितं॑ ह॒विः स्वाहा॑॥ १ ॥ ब्रह्म॒ स्रुचो॑ घृ॒तवती॑र्ब्रह्म॑णा॒ वेदि॒रुद्धि॑ता। ब्रह्म॑ य॒ज्ञश्च॑ स॒त्रं च॒ ऋत्विजो॒ ये ह॑वि॒ष्कृत॑:। श॒मिताय॒ स्वाहा॑॥ २ ॥ अं॒हो॒मुचे॒ प्र भरे मनी॒षामा सु॒त्राम्णै॑ सु॒म॒तिमा॑वृणा॒नः। इ॒दमि॑न्द्र॒ प्रति॑ ह॒व्यं गृ॑भाय स॒त्याः स॑न्तु॒ यज॑मानस्य॒ कामाः॒ स्वाहा॑॥ ३ ॥