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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

संन्यासप्रकरणम् २७५ संन्यास लेना सफल और धन्यवाद के योग्य है ॥ १९ ॥ जब संन्यासी सब पदार्थों में अपनेपन के भाव से निःस्पृह होता है, तभी इस लोक, इस जन्म और मरण पाकर परलोक और मुक्ति में परमात्मा को प्राप्त होके निरन्तर* सुख को प्राप्त होता है॥२०॥ इस विधि से धीरे-धीरे सब संग से हुए दोषों को छोड़के सब हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से विशेषकर निर्मुक्त होके विद्वान् संन्यासी ब्रह्म ही में स्थिर होता है ॥ २१ ॥ और जो विविदिषा, अर्थात् जानने की इच्छा करके गौण संन्यास लेवे वह भी विद्या का अभ्यास, सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास और ओंकार का जप और उसके अर्थ=परमेश्वर का विचार भी किया करे। यही अज्ञानियों का शरण, अर्थात् गौण संन्यासियों और यही विद्वान् संन्यासियों का और यही सुख का खोज करनेवाले और यही अनन्त** सुख की इच्छा करनेवाले मनुष्यों का आश्रय है ॥ २२ ॥ इस क्रमानुसार संन्यासयोग से जो द्विज, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य संन्यास ग्रहण करता है वह इस संसार और शरीर में सब पापों को छोड़-छुड़ाके परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ विधि—जो पुरुष संन्यास लेना चाहे वह जिस दिन सर्वथा प्रसन्नता हो उसी दिन से नियम और व्रत, अर्थात् तीन दिन तक दुग्धपान करके उपवास और भूमि में शयन और प्राणायाम, ध्यान तथा एकान्तदेश में ओंकार का जप किया करे और पृष्ठ २२-२४ में लिखे प्रमाणे सभामण्डप, वेदी, समिधा,

  • निरन्तर शब्द का इतना ही अर्थ है कि मुक्ति के नियत समय के मध्य में दुःख आकर विघ्न नहीं कर सकता। ** अनन्त इतना ही है कि मुक्तिसुख के समय में अन्त अर्थात् जिसका नाश न होवे।