भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

संन्यासप्रकरणम् २८१ इन ५० मन्त्रों से आज्याहुति देके तदनन्तर जो संन्यास लेनेवाला है, वह पाँच वा छह केशों को छोड़कर पृष्ठ ८६- ८७ में लिखे प्रमाणे दाढ़ी, मूँछ, केश, लोमों का छेदन, अर्थात् क्षौर कराके यथावत् स्नान करे। तदनन्तर संन्यास लेनेवाला पुरुष अपने शिर पर पुरुषसूक्त के मन्त्रों से १०८ बार अभिषेक करे। पुनः पृष्ठ २१७-२१८ में लिखे प्रमाणे आचमन और प्राणायाम करके, हाथ जोड़, वेदी के सामने नेत्रोन्मीलन कर मन से— ओं ब्रह्मणे नमः ॥ ओ३मिन्द्राय नमः ॥ ओं सूर्याय नमः ॥ ओं सोमाय नमः ॥ ओमात्मने नमः ॥ ओमन्तरात्मने नमः ॥ इन छह मन्त्रों को जपके— ओमात्मने स्वाहा ॥ ओमन्तरात्मने स्वाहा ॥ ओं परमात्मने स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इन चार मन्त्रों से चार आज्याहुति देकर, कार्यकर्त्ता—संन्यास ग्रहण करनेवाला पुरुष पृष्ठ १५२-१५३ में लिखे प्रमाणे मधुपर्क की क्रिया करे। तदनन्तर प्राणायाम करके— ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि ॥ ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ इन मन्त्रो को मन से जपे। पुनः— ओम् अग्नये स्वाहा ॥ ओं भूः प्रजापंतये स्वाहा ॥ ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥