संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ संस्कारविधिः ओं ब्रह्मणे स्वाहा ॥ ओं प्राणाय स्वाहा ॥ ओमपानाय स्वाहा ॥ ओं व्यानाय स्वाहा ॥ ओमुदानाय स्वाहा ॥ ओं समानाय स्वाहा ॥ इन मन्त्रों से वेदी में आज्याहुति देके— ओं भूः स्वाहा ॥ इन मन्त्र से पूर्णाहुति करके— पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्चोत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति* ॥ —श० कां० १४ पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणा मया परित्यक्ता, मत्तः सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु स्वाहा* ॥ इस वाक्य को बोलके सबके सामने जल को भूमि में छोड़ देवे। पीछे नाभिमात्र जल में पूर्वाभिमुख खड़ा रहकर— ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि ॥ ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि परो रजसेऽसावदोम् ॥ इसका मनसे जप करके प्रणवार्थ परमात्मा का ध्यान करके
- पुत्रादि के मोह, वित्तादि पदार्थों के मोह और लोकस्थ प्रतिष्ठा की इच्छा से मन को हटाकर परमात्मा में आत्मा को दृढ़ करके जो भिक्षाचरण करते हैं वे ही सबको सत्योपदेश से अभयदान देते हैं, अर्थात् दाहिने हाथ में जल लेके मैंने आज से पुत्रादि का तथा वित्त का मोह और लोक में प्रतिष्ठा की इच्छा करने का त्याग कर दिया, और मुझसे सब भूत=प्राणिमात्र को अभय प्राप्त होवे, यह मेरी सत्य वाणी है।