संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० संस्कारविधिः करके अङ्गों का स्पर्श करें— ओं वाङ् म आस्येऽस्तु ॥ इस मन्त्र से मुख। ओं नसोर्मे प्राणोऽस्तु ॥ इस मन्त्र से नासिका के दोनों छिद्र। ओम् अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों आँखें। ओं कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों कान। ओं बाह्वोर्मे बलमस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों बाहु। ओम् ऊर्वोर्मऽओजोऽस्तु ॥ इस मन्त्र से दोनों जंघा और ओम् अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु ॥ इस मन्त्र से दाहिने हाथ से जल-स्पर्श करके मार्जन करना। (पुनः) पूर्वोक्त समिधाचयन वेदी में करें। पुनः— ओं भूर्भुवः स्वः ॥ इस मन्त्र का उच्चारण करके ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य के घर से अग्नि ला, अथवा घृत का दीपक जला, उससे कपूर में लगा, किसी एक पात्र में धर, उसमें छोटी-छोटी लकड़ी लगाके यजमान वा पुरोहित उस पात्र को दोनों हाथों से उठा, यदि गर्म हो तो चिमटे से पकड़कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करे। वह मन्त्र यह है— ओं भूर्भुव॒ः स्व॒द्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा। तस्या॑स्ते पृथिवी देवयजनि पृ॒ष्ठेऽग्निम॑न्नाद॒मन्नाद्या॑यादधे ॥ —यजुः० अ० ३। मं० ५॥ इस मन्त्र से वेदी के बीच में अग्नि को धर, उसपर छोटे- छोटे काष्ठ और थोड़ा कपूर धर, अगला मन्त्र पढ़के व्यजन से अग्नि को प्रदीप्त करे— ओम् उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि त्वमि॑ष्टापू॒र्ते सꣳसृ॑जेथाम॒यं च॑। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ऽअध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ दे॒वा यज॑मानश्च सीदत ॥ —यजुः० अ० १५। मं० ५४॥ जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे, तब चन्दन की