संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसामान्यप्रकरणम् ३१ अथवा उपरिलिखित पलाशादि की तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डुबा, उनमें से एक-एक निकाल नीचे लिखे एक-एक मन्त्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मन्त्र ये हैं— ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे—इदं न मम॥ १ ॥ —इस मन्त्र से एक। ओं स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॒धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन् स्वाहा॑॥ इदमग्नये—इदं न मम॥ २ ॥ —इससे, और सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे स्वाहा॑॥ इदमग्नये जातवेदसे—इदं न मम॥ ३ ॥ —इस मन्त्र से अर्थात् इन दोनों से दूसरी। तन्त्वा॑ स॒मिद्भि॑िरङ्गिरो घृ॒तेन॑ वर्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यविष्ठ्य॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नयेऽङ्गिरसे—इदं न मम॥ ४ ॥ —यजुः० अ० ३। मं० १, २, ३॥ इस मन्त्र से तीसरी समिधा की आहुति देवें। इन मन्त्रों से समिदाधान करके होम का शाकल्य, जोकि यथावत् विधि से बनाया हो, सुवर्ण, चाँदी, काँसा आदि धातु के पात्र अथवा काष्ठ-पात्र में वेदी के पास सुरक्षित धरें, पश्चात् उपरिलिखित घृतादि जोकि उष्ण कर छान, पूर्वोक्त सुगन्ध्यादि पदार्थ मिलाकर पात्रों में रक्खा हो, उसमें से कम-से-कम ६ मासाभर घृत वा अन्य मोहनभोगादि जो कुछ सामग्री हो, अधिक-से-अधिक छटांकभर की आहुति देवें, यही आहुति का परिमाण है।