संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 41, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसामान्यप्रकरणम् ३७ महावामदेव्यम् क॑ाऽ५या । नश्चा४३ यित्रा२३ आभुवा४त् ५। ऊ१ । ती स२दा१वृ२धः स१। खा। औ२३ हो२हा२यि। कया२३ शचायि१। ष्ठयौ३हो२३। हुँम१ा५२। वाऽ२र्तॊ३ऽ५हा२यि ॥ (१)॥ क१ाऽ५स्त्व२ाँ। सत्यो४३मा२३दा४ना५म्। मा१। हिष्ठो३मा२त्सा१दन्ध२। सा। औ२३हो२हा२यि। दृढा२३ चिदा१। रुजौ३हो२३। हुँम१ा५२। वा१ऽ२सो२३ऽ५हा२यि ॥ (२)॥ आ३ऽ५भी१। षुणाँ४३ः स२ा३खीना४म् ५। आ१। वि२ता जरा१यि तृ२। णाँ१म्। औ२२३ हो२ हायि२। शंता२३म्२भवा। सियौ३हो२३ हुँम१ा५२। ता१ऽ२ यो२३ऽ५हा२यि ॥ (३)॥ —साम० उत्तरार्चिके। अध्याये १। खं० ४। मं० १, २, ३॥ यह [महा] वामदेव्यगान होने के पश्चात् गृहस्थ स्त्रीपुरुष, कार्यकर्त्ता सद्धर्मी, लोकप्रिय, परोपकारी, सज्जन, विद्वान् वा त्यागी, पक्षपातरहित संन्यासी, जो सदा विद्या की वृद्धि और सबके कल्याणार्थ वर्त्तनेवाले हों उनको नमस्कार, आसन, अन्न, जल, वस्त्र, पात्र, धन आदि के दान से उत्तम प्रकार से यथासामर्थ्य सत्कार करें। पश्चात् जो कोई देखने ही के लिए आये हों, उनको भी सत्कारपूर्वक विदा कर दें। अथवा जो संस्कार-क्रिया को देखना चाहें, वे पृथक्- पृथक् मौन करके बैठे रहें, कोई बातचीत हल्ला-गुल्ला न करने पावें। सब लोग ध्यानावस्थित प्रसन्नवदन रहें। विशेष कर्मकर्त्ता और कर्म करानेवाले शान्ति, धीरज और विचारपूर्वक क्रम से कर्म करें और करावें। यह सामान्यविधि अर्थात् सब संस्कारों में कर्त्तव्य है॥ ॥ इति सामान्यप्रकरणम्॥