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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 318 में से

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अथ गर्भाधानविधिं वक्ष्यामः निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। —मनुस्मृति-द्वितीयाध्याये, श्लोकः १६ ॥ अर्थ—मनुष्यों के शरीर और आत्मा के उत्तम होने के लिए निषेक अर्थात् गर्भाधान से लेके श्मशानान्त अर्थात् अन्त्येष्टि=मृत्यु के पश्चात् मृतक शरीर का विधिपूर्वक दाह करने पर्यन्त १६ संस्कार होते हैं। शरीर का आरम्भ गर्भाधान और शरीर का अन्त भस्म कर देने तक सोलह प्रकार के उत्तम संस्कार करने होते हैं। उनमें से प्रथम गर्भाधान-संस्कार है। गर्भाधान उसको कहते हैं कि जो "गर्भस्याऽऽधानं वीर्यस्थापनं स्थिरीकरणं यस्मिन् येन वा कर्मणा, तद् गर्भाधानम्" गर्भ का धारण, अर्थात् वीर्य का स्थापन गर्भाशय में स्थिर करना जिससे होता है। जैसे बीज और क्षेत्र के उत्तम होने से अन्नादि पदार्थ भी उत्तम होते हैं, वैसे उत्तम, बलवान् स्त्री-पुरुषों से [उत्पन्न] सन्तान भी उत्तम होते हैं। इससे पूर्ण युवावस्था [पर्यन्त] यथावत् ब्रह्मचर्य का पालन और विद्याभ्यास करके, अर्थात् न्यून-से- न्यून १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का पुरुष अवश्य हो और इससे अधिक वयवाले होने से अधिक उत्तमता होती है, क्योंकि बिना सोलहवें वर्ष के गर्भाशय में बालक के शरीर को यथावत् बढ़ने के लिए अवकाश और गर्भ के धारण-पोषण का सामर्थ्य कभी नहीं होता और २५ वर्ष के बिना पुरुष का वीर्य भी उत्तम नहीं होता। इसमें यह प्रमाण है—

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