संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्भाधानप्रकरणम् ३९ पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे । समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक् ॥ १ ॥ —सुश्रुते सूत्रस्थाने, अ० ३५ । १० ॥ ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् । यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥ २ ॥ जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥ ३ ॥ —सुश्रुते सूत्रस्थाने, अ० १० । ४७-४८ ॥ ये सुश्रुत के श्लोक हैं। शरीर की उन्नति वा अवनति का विधि जैसा वैद्यकशास्त्र में है, वैसा अन्यत्र नहीं। जो उसका मूल विधान है, वह आगे वेदारम्भ में लिखा जाएगा, अर्थात् किस-किस वर्ष में कौन-कौन धातु किस-किस प्रकार का कच्चा वा पक्का, वृद्धि वा क्षय को प्राप्त होता है, यह सब वैद्यकशास्त्र में विधान है, इसलिए गर्भाधानादि संस्कारों के करने में वैद्यकशास्त्र का आश्रय विशेष लेना चाहिए। अब देखिए सुश्रुतकार परम वैद्य कि जिनका प्रमाण सब विद्वान् लोग मानते हैं, वे विवाह और गर्भाधान का समय न्यून- से-न्यून १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का पुरुष अवश्य होवे, यह लिखते हैं। जितना सामर्थ्य २५वें वर्ष में पुरुष के शरीर में होता है, उतना ही सामर्थ्य १६वें वर्ष में कन्या के शरीर में हो जाता है। इसलिए वैद्य लोग पूर्वोक्त अवस्था में दोनों को समवीर्य अर्थात् तुल्य सामर्थ्यवाले जानें ॥ १ ॥ सोलह वर्ष से न्यून अवस्था की स्त्री में २५ वर्ष से कम अवस्था का पुरुष यदि गर्भाधान करता है, तो वह गर्भ उदर में ही बिगड़ जाता है ॥ २ ॥