संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० संस्कारविधिः और जो उत्पन्न भी हो तो अधिक नहीं जीवे, अथवा कदाचित् जीवे भी तो उसके अत्यन्त दुर्बल शरीर और इन्द्रिय हों। इसलिए अत्यन्त बाला अर्थात् सोलह वर्ष की अवस्था से कम अवस्था की स्त्री में कभी गर्भाधान् नहीं करना चाहिए ॥ ३ ॥ चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धियोंवनं सम्पूर्णता किञ्चित्परिहाणिश्चेति । आषोडशाद् वृद्धिराचतुर्विंश- तेर्यौवनमाचत्वारिंशतः सम्पूर्णता ततः किञ्चित्परिहाणि- श्चेति ॥ अर्थ—सोलहवें वर्ष से आगे मनुष्य के शरीर के सब धातुओं की वृद्धि और पच्चीसवें वर्ष से युवावस्था का आरम्भ, चालीसवें वर्ष में युवावस्था की पूर्णता अर्थात् सब धातुओं की पूर्णपुष्टि, और उससे आगे किंचित्-किंचित् धातु=वीर्य की हानि होती है, अर्थात् चालीसवें वर्ष [तक] सब अवयव पूर्ण हो जाते हैं। पुनः खान-पान से उत्पन्न जो वीर्य धातु होता है, वह कुछ-कुछ क्षीण होने लगता है। इससे यह सिद्ध होता है कि यदि शीघ्र विवाह करना चाहें, तो कन्या १६ वर्ष की और पुरुष २५ वर्ष का अवश्य होना चाहिए। मध्यम समय कन्या का बीस वर्षपर्यन्त और पुरुष का चालीसवाँ वर्ष, और उत्तम समय कन्या का चौबीस वर्ष और पुरुष का अड़तालीस वर्षपर्यन्त का है। जो अपने कुल की उत्तमता, उत्तम सन्तान, दीर्घायु, सुशील, बुद्धि-बल-पराक्रमयुक्त, विद्वान् और श्रीमान् करना चाहें, वे सोलहवें वर्ष से पूर्व कन्या और पच्चीसवें वर्ष से पूर्व पुत्र का विवाह कभी न करें। यही सब सुधार का सुधार, सब सौभाग्यों का सौभाग्य और सब उन्नतियों की उन्नति करनेवाला कर्म है कि इस अवस्था में ब्रह्मचर्य रखके अपने सन्तानों को विद्या और सुशिक्षा ग्रहण करावें कि जिससे उत्तम सन्तान होवें।