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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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४२ संस्कारविधिः स्त्री-पुरुष रतिक्रिया कभी न करें॥ १॥ स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल १६ रात्रि का है, अर्थात् रजोदर्शन दिन से लेके सोलहवें दिन तक ऋतु-समय है। उनमें से प्रथम की चार रात्रि अर्थात् जिस दिन रजस्वला हो उस दिन से लेके चार दिन निन्दित हैं। प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ रात्रि में पुरुष स्त्री का स्पर्श और स्त्री पुरुष का सम्बन्ध कभी न करे, अर्थात् उस रजस्वला के हाथ का छुआ पानी भी न पीवे। न वह स्त्री कुछ काम करे, किन्तु एकान्त में बैठी रहे, क्योंकि इन चार रात्रियों में समागम करना व्यर्थ और महारोगकारक है। रजः अर्थात् स्त्री के शरीर से एक प्रकार का विकृत उष्ण रुधिर, जैसाकि फोड़े में से पीव वा रुधिर निकलता है, वैसा है॥ २॥ और जैसे प्रथम की चार रात्रि ऋतुदान देने में निन्दित हैं, वैसे ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निन्दित हैं। और बाकी रहीं दश रात्रि, सो ऋतुदान देने में श्रेष्ठ हैं॥ ३॥ जिनको पुत्र की इच्छा हो, वे छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, चौदहवीं और सोलहवीं—ये छह रात्रि ऋतुदान में उत्तम जानें, परन्तु इनमें भी उत्तर-उत्तर श्रेष्ठ हैं। और जिनको कन्या की इच्छा हो, वे पाँचवीं, सातवीं, नववीं और पन्द्रहवीं—ये चार रात्रि उत्तम समझें*। इससे पुत्रार्थी युग्म रात्रियों में ऋतुदान देवे ॥ ४॥ पुरुष के अधिक वीर्य होने से पुत्र और स्त्री के आर्त्तव अधिक होने से कन्या, तुल्य होने से नपुंसक पुरुष वा बन्ध्या स्त्री, क्षीण और अल्पवीर्य से गर्भ का न रहना वा रहकर गिर जाना होता है॥ ५॥ जो पूर्व निन्दित आठ रात्रि कह आये हैं, उनमें जो स्त्री का संग छोड़ देता है, वह गृहाश्रम में बसता हुआ भी ब्रह्मचारी

  • रात्रिगणना इसलिए की है कि दिन में ऋतुदान का निषेध है।