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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

गर्भाधानप्रकरणम् ४३ ही कहाता है ॥ ६ ॥ उपनिषदि गर्भलम्भनम् ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥ जैसा उपनिषद् में गर्भस्थापन-विधि लिखा है, वैसा करना चाहिए, अर्थात् पूर्वोक्त जैसाकि सोलहवें और पच्चीसवें वर्ष में विवाह करके ऋतुदान लिखा है, वही उपनिषद् में भी विधान है। अथ गर्भाधानᳵस्त्रियाः पुष्पवत्याश्चतुरहादूर्ध्वᳵ स्नात्वा विरुजायास्तस्मिन्नेव दिवा ‘आदित्यं गर्भमिति' ॥ —यह पारस्करगृह्यसूत्र का वचन है॥ ऐसा ही गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में भी विधान है। इसके अनन्तर स्त्री जब रजस्वला होकर चौथे दिन के उपरान्त पाँचवें दिन स्नान कर रज-रोगरहित हो, उसी दिन (आदित्यं गर्भमिति) इत्यादि मन्त्रों से, जिस रात्रि में गर्भस्थापन करने की इच्छा हो, उससे पूर्व दिन में सुगन्धादि पदार्थों सहित पूर्व सामान्यप्रकरण के लिखित प्रमाणे हवन करके निम्नलिखित मन्त्रों से आहुति देनी। यहाँ पत्नी पति के वाम-भाग में बैठे, और पति वेदी के पश्चिमाभिमुख पूर्व-दक्षिण वा उत्तर दिशा में यथाभीष्ट मुख करके बैठे, और ऋत्विज भी चारों दिशाओं में यथामुख बैठें— ओम् अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीरूस्तनूस्तामस्या अपजहि स्वाहा ॥ इदमग्नये- इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्राश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीरूस्तनूस्तामस्या अपजहि स्वाहा ॥ इदं वायवे - इदन्न मम ॥ २ ॥