संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ संस्कारविधिः ओं वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ १७ ॥ ओं चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ १८ ॥ ओं सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपजहि स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ १९ ॥ ओम् अग्निर्वायुचन्द्रसूर्याः प्रायश्चित्तयो यूयं देवानां प्रायश्चित्तयः स्थ ब्राह्मणो वो नाथकाम उपधावामि यास्या अपसव्या तनूस्तामस्या अपहत स्वाहा ॥ इदमग्निर्वायुचन्द्र- सूर्येभ्यः—इदन्न मम ॥ २० ॥ इन बीस मन्त्रों से बीस आहुति देनी* और बीस आहुति करने से यत्किंचित् घृत बचे, वह काँसे के पात्र में ढाँकके रख देवे। इसके पश्चात् भात की आहुति देने के लिए यह विधि करना, अर्थात् एक चाँदी वा काँसे के पात्र में भात रखके उसमें घी, दूध और शक्कर मिलाके कुछ थोड़ी देर रखके जब घृत आदि भात में एकरस हो जाएँ, पश्चात् नीचे लिखे एक- एक मन्त्र से एक-एक आहुति अग्नि में देवे और स्रुवा का शेष घृत आगे धरे हुए काँसे के उदकपात्र में छोड़ता जावे—
- इन बीस आहुतियों को देते समय वधू अपने दक्षिण हाथ से वर के दक्षिण स्कन्ध पर स्पर्श कर रक्खे।