संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगर्भाधानप्रकरणम् ४९ ओं स्वरादित्याय स्वाहा ॥ इदमादित्याय-इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओम् अग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा। इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः-इदन्न मम ॥ ४ ॥ पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रों से घृत की आहुति देनी— ओम् अयास्यग्नेऽवर्षट्कृतं यत्कर्मणोऽत्यरीरिचं देवा गातुविदः स्वाहा ॥ इदं देवोभ्यो गातुविद्भ्यः-इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये-इदन्न मम ॥ २ ॥ इन कर्म और आहुतियों के पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे ( ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं० ) इस मन्त्र से एक स्विष्टकृत् आहुति घृत की देवें। जो इन मन्त्रों से आहुति देते समय प्रत्येक आहुति के स्रुवा में शेष रहे घृत को आगे धरे हुए काँसे के उदकपात्र में इकट्ठा करते गये हों, जब आहुति हो चुकें, तब उन आहुतियों के शेष घृत को वधू लेके स्नानघर में जाकर उस घी का पग के नख से लेके शिरपर्यन्त सब अङ्गों पर मर्दन करके स्नान करे। तत्पश्चात् शुद्ध वस्त्र से शरीर पोंछ, शुद्ध वस्त्र धारण करके कुण्ड के समीप आवे। तब दोनों वधू-वर कुण्ड की प्रदक्षिणा करके सूर्य का दर्शन करें। उस समय— ओम् आ॒दि॒त्यं गर्भं॒ पर्य॑सा॒ सम॑ङ्ग्धि स॒हस्र॑स्य प्रति॒मां वि॒श्वरू॑पम्। परि॑वृङ्ग्धि॒ हर॑सा॒ माभिर्म॑थ्स्थाः श॒तायु॑षं कृणुहि ची॒यमा॑नः ॥ १ ॥ सूर्यो॑ नो दि॒वस्पा॑तु॒ वातो॑ अ॒न्तरि॑क्षात्। अ॒ग्निर्नः॒ पार्थि॑वेभ्यः ॥ २ ॥ जोषा॑ सवितृर्यस्य॑ ते॒ हरः॑ श॒तं स॒वाँ अर्ह॑ति। पा॒हि नो॑ दि॒द्युतः॒ पत॑न्त्याः ॥ ३ ॥