संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
DevanagariHindipublished318 पृष्ठ
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गर्भाधानप्रकरणम् ५३ मन्त्रों से आहुति देवें*— यथा॒ वातः॑ पुष्क॒रिणीं॑ स॒मिङ्गय॑ति स॒र्वत॑:। ए॒वा ते॒ गर्भ॑ एजतु॒ निरै॑तु॒ दश॑मास्य॒: स्वाहा॑ ॥ १ ॥ यथा॒ वातो॒ यथा॒ वनं॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति। ए॒वा त्वं द॑शमास्य॒ सहावै॑हि ज॒रायु॑णा॒ स्वाहा॑ ॥ २ ॥ दश॒ मासा॑ञ्छशया॒नः कु॑मा॒रो अधि॑ मा॒तरि॑। निरै॑तु॒ जीवो॒ अक्ष॑तो॒ जीवो॒ जीवन्त्या॒ अधि॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ —ऋ० म० ५ । सू० ७८ । मं० ७-९ ॥ एज॑तु॒ दश॑मास्यो॒ गर्भो॑ ज॒रायु॑णा स॒ह। यथा॒यं वा॒युरेर्ज॑ति यथा॑ समु॒द्रऽ एज॑ति। ए॒वायं दश॑मास्यो॒ऽ अस्त्र॑ञ्ज॒रायु॑णा स॒ह स्वाहा॑ ॥ १ ॥
- यदि दो ऋतुकाल व्यर्थ जाएँ अर्थात् दो महीनों में दो बार गर्भाधान क्रिया निष्फल हो जाए, गर्भस्थिति न होवे, तो तीसरे महीने में जब ऋतुकाल समय आवे तब पुष्यनक्षत्रयुक्त ऋतुकाल दिवस में प्रथम प्रातःकाल उपस्थित होवे, तब प्रथम प्रसूता गाय का दही दो मासा और यव के दानों को सेकके पीसके दो मासा लेके इन दोनों को एकत्र करके पत्नी के हाथ में देके उससे पति पूछे— “किं पिबसि”। इस प्रकार तीन बार पूछे, और स्त्री भी अपने पति को “पुंसवनम्” इस वाक्य को तीन बार बोलके उत्तर देवे और उसका प्राशन करे। इसी रीति से पुनः-पुनः तीन बार विधि करना। तत्पश्चात् सङ्घाहुलि वा भटकटाई ओषधि को जल में महीन पीसके उसका रस कपड़े में छानके पति पत्नी के दाहिने नाक के छिद्र में सिञ्चन करे। और पति— ओम् इयमोषधी त्रायमाणा सहमाना सरस्वती। अस्या अहं बृहत्याः पुत्रः पितुरिव नाम जग्रभम्॥ इस मन्त्र से जगन्नियन्ता परमात्मा की प्रार्थना करके यथोक्त ऋतुदान विधि करें। यह सूत्रकार का मत है।