भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

५४ संस्कारविधिः य॒स्यै ते॑ य॒ज्ञियो॒ गर्भो॒ यस्यै॒ योनि॑र्हिर॒ण्ययी॑ । अङ्गान्यहु॑ता॒ यस्य॒ तं मा॒त्रा सर्म॑जीगम॒थ् स्वाहा॑ ॥ २ ॥ —यजुः० अ० ८ । मं० २८, २९ ॥ पुमाग्ंसौ मित्रावरुणौ पुमाग्ंसावश्विनावुभौ । पुमानग्निश्च वायुश्च पुमान् गर्भस्तवोदरे स्वाहा ॥ १ ॥ पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः । पुमाग्ंसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताग्ं स्वाहा ॥ २ ॥ —सामवेदे ॥ इन मन्त्रों से आहुति देकर पूर्वलिखित सामान्यप्रकरण की शान्त्याहुति देके, पुनः ३६ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे पूर्णाहुति देवें। पुनः स्त्री के भोजन-छादन का सुनियम करे। कोई मादक मद्य आदि, रेचक हरीतकी आदि, क्षार अतिलवणादि, अत्यम्ल अर्थात् अधिक खटाई, रूक्ष चणे आदि, तीक्ष्ण अधिक लालमिर्ची आदि स्त्री कभी न खावे, किन्तु घृत, दुग्ध, मिष्ट, सोमलता अर्थात् गुडूच्यादि ओषधि, चावल, मिष्ट, दधि, गेहूँ, उर्द, मूँग, तूअर आदि अन्न और पुष्टिकारक शाक खावें। उसमें ऋतु-ऋतु के मसाले—गर्मी में ठण्डे सफेद इलायची आदि और सर्दी में केशर, कस्तूरी आदि डालकर खाया करे। युक्ताहार-विहार सदा किया करे। दूध में सुंठि और ब्राह्मी ओषधि का सेवन स्त्री विशेष किया करे, जिससे सन्तान अतिबुद्धिमान्, रोगरहित, शुभ गुण-कर्म-स्वभाववाला होवे ॥ ॥ इति गर्भाधानविधिः समाप्तः ॥