भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

३ अथ पुंसवनम् 'पुंसवन' संस्कार का समय गर्भस्थिति-ज्ञान हुए समय से दूसरे वा तीसरे महीने में है। उसी समय पुंसवन संस्कार करना चाहिए, जिससे पुरुषत्व अर्थात् वीर्य का लाभ होवे। यावत् बालक के जन्म हुए पश्चात् दो महीने न बीत जावें, तबतक पुरुष ब्रह्मचारी रहकर स्वप्न में भी वीर्य को नष्ट न होने देवे। भोजन-छादन, शयन-जागरणादि व्यवहार उसी प्रकार से करे, जिससे वीर्य स्थिर रहे और दूसरा सन्तान भी उत्तम होवे। अत्र प्रमाणानि पुमाꣳ॒सौ मित्रावरुणौ पुमाꣳ॒सावश्विनावुभौ। पुमान॒ग्निश्च॑ वायु॒श्च पुमान् गर्भस्तवोदरे॥ १॥ पुमान॒ग्निः पुमा॒निन्द्रः पुमा॒न्देवो बृहस्पतिः। पुमाꣳ॒सं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताम्॥ २॥ —सामवेदे ॥ श॒मीम॑श्व॒त्थ आरू॑ढ॒स्तत्र॑ पुं॒सवनं॑ कृ॒तम्। तद्वै पु॒त्रस्य॑ वेद॒नं तत् स्त्रीष्वा भरा॑मसि॥ १॥ पुं॒सि वै रेतो॑ भव॒ति तत् स्त्रियामनु॑ षिच्यते। तद्वै पु॒त्रस्य॑ वेद॒नं तत् प्र॒जाप॑तिरब्रवीत्॥ २॥ प्र॒जाप॑तिरनु॑मतिः सिनी॒वाल्य॑चीक्लृपत्। स्त्रैषू॑य॒मन्यत्र॑ दध॒त् पुमां॑समु दधदि॒ह॥ ३॥ —अथर्व० का० ६। सू० ११॥ इन मन्त्रों का यही अभिप्राय है कि पुरुष को वीर्यवान्