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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

५६ संस्कारविधिः होना चाहिए। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण— अथास्यै मण्डलागारच्छायायां दक्षिणस्यां नासिकायामजीतामोषधीं नस्तः करोति ॥ १ ॥ प्रजावज्जीवपुत्राभ्यां हैके ॥ २ ॥ गर्भ के दूसरे वा तीसरे महीने में वटवृक्ष की जटा वा उसकी पत्ती लेके स्त्री के दक्षिण नासापुट से सुँघावे और कुछ अन्य पुष्ट अर्थात् गुडच जो गिलोय वा ब्राह्मी ओषधि खिलावे। ऐसा ही पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण है— अथ पुंसवनं पुरा स्पन्दत इति मासे द्वितीये तृतीये वा ॥ इसके अनन्तर 'पुंसवनं' उसको कहते हैं, जो पूर्व ऋतुदान देकर गर्भस्थिति से दूसरे वा तीसरे महीने में पुंसवन-संस्कार किया जाता है। इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में भी लिखा है। अथ क्रियारम्भः—पृष्ठ ९ से २१वें पृष्ठ के शान्तिकरणपर्यन्त कहे प्रमाणे (विश्वानि देव०) इत्यादि चारों वेदों के मन्त्रों से यजमान और पुरोहितादि ईश्वरोपासना करें और जितने पुरुष वहाँ उपस्थित हों, वे भी परमेश्वरोपासना में चित्त लगावें और पृष्ठ १३-१७ में कहे प्रमाणे स्वस्तिवाचन तथा पृष्ठ १८-२१ में लिखे प्रमाणे शान्तिकरण करके पृष्ठ २२ में लिखे प्रमाणे यज्ञदेश, यज्ञशाला तथा पृष्ठ २३ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड, यज्ञसमिधा, होम के द्रव्य और स्थालीपाक आदि करके और पृष्ठ ३०-३२ में लिखे प्रमाणे (अयन्त इध्म०) इत्यादि [इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान], (ओम् अदिते०) इत्यादि चार [मन्त्रों से] मन्त्रोक्त कर्म [जल-प्रोक्षण] और आघारावाज्यभागाहुति ४ तथा व्याहृति आहुति ४ और पृष्ठ ३२ में [लिखे प्रमाणे]