भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 318 में से

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५८ संस्कारविधिः इन दो मन्त्रों को बोलके पति अपनी गर्भिणी पत्नी के गर्भाशय पर हाथ धरके यह मन्त्र बोले— सु॒प॒र्णोऽसि॑ ग॒रुत्माँस्त्रिवृत्ते॑ शिरो॑ गाय॒त्रं चक्षु॑र्बृहद्रथन्त॒रे प॒क्षौ। स्तोम॑ऽआ॒त्मा छन्दाँ॒स्यङ्गा॑नि॒ यजूं॑षि॒ नाम॑। साम॑ ते त॒नूर्वाम॑दे॒व्यं य॒ज्ञाय॒ज्ञियं॒ पुच्छं॒ धिष्ण्या॑: श॒फाः। सु॒प॒र्णोऽसि॑ ग॒रुत्मान्॒ दिवं॑ गच्छ॒ स्वः॑ पत॥ —य० अ० १२। मं० ४॥ इसके पश्चात् स्त्री सुनियम, युक्ताहार-विहार करे। विशेषकर गिलोय, ब्राह्मी ओषधि और सुंठी को दूध के साथ थोड़ी-थोड़ी खाया करे और अधिक शयन और अधिक भाषण, अधिक खारा, खट्टा, तीखा, कड़वा, रेचक हरड़े आदि न खावे। सूक्ष्म आहार करे। क्रोध, द्वेष, लोभादि में न फँसे, चित्त को सदा प्रसन्न रक्खे इत्यादि शुभाचरण करे॥ ॥ इति पुंसवनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

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