संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सीमन्तोन्नयनम् अब तीसरा संस्कार ‘सीमन्तोन्नयन’ कहते हैं, जिससे गर्भिणी स्त्री का मन सन्तुष्ट, आरोग्य, गर्भ स्थिर, उत्कृष्ट होवे और प्रतिदिन बढ़ता जावे। इसमें आगे प्रमाण लिखते हैं— चतुर्थे गर्भमासे सीमन्तोन्नयनम् ॥ १ ॥ आपूर्यमाणपक्षे यदा पुंसा नक्षत्रेण चन्द्रमा युक्तः स्यात् ॥ २ ॥ अथास्यै युग्मेन शलालुग्रप्सेन त्रेण्या च शलल्या त्रिभिश्च कुशपिञ्जूलैरूर्ध्वं सीमन्तं व्यूहति भूर्भुवःस्वरोमिति त्रिः चतुर्वा ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र ॥ पुंसवनवत् प्रथमे गर्भे मासे षष्ठेऽष्टमे वा ॥ —यह पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण ॥ इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्र में भी लिखा है। अर्थ—गर्भमास से चौथे महीने में शुक्लपक्ष में जिस दिन मूल आदि पुरुष नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा हो, उसी दिन सीमन्तोन्नयन संस्कार करें और पुंसवन-संस्कार के तुल्य छठे, आठवें महीने में पूर्वोक्त पक्ष, नक्षत्रयुक्त चन्द्रमा के दिन सीमन्तोन्नयन-संस्कार करें । अथ विधिः—इसमें प्रथम ९-३१ पृष्ठ तक का विधि करके (अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाण वेदी के पूर्वादि दिशाओं में जल सेचन करके— ओम् दे॒व स॑वि॒तः प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु॒ वाच॒स्पति॒र्वाचं॑ नः स्वद॑तु॒ स्वाहा॑ ॥ —य० अ० ३० । मं० ७ ॥