भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 318 में से

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पृष्ठ 73

जातकर्मप्रकरणम् ६९ यत्ते सुसीमे हृदयꣳ हितमन्तः प्रजापतौ। वेदाहं मन्ये तद् ब्रह्म माहं पौत्रमघं निगाम्॥२॥ यत् पृथिव्या अनामृतं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्। वेदामृतस्याहं नाम माहं पौत्रमघꣳ रिषम्॥३॥ इन्द्राग्नी शर्म यच्छतं प्रजायै मे प्रजापतिः। यथायं न प्रमीयते पुत्रो जनित्र्या अधि॥४॥ यददश्चन्द्रमसि कृष्णं पृथिव्या हृदयꣳ श्रितम्। तदहं विद्वाꣳस्तत् पश्यन्माहं पौत्रमघꣳ रुदम्॥५॥ इन मन्त्रों को पढ़ता हुआ सुगन्धित जल से प्रसूता के शरीर का मार्जन करे। कोऽसि कतमोऽस्येषोऽस्यमृतोऽसि । आहस्पत्यं मासं प्रविशासौ ॥६॥ स त्वाह्ने परिददात्वहस्त्वा रात्र्यै परिददातु रात्रिस्त्वा- होरात्राभ्यां परिददात्वहोरात्रौ त्वाईमासेभ्यः परि- दत्तामर्द्धमासास्त्वा मासेभ्यः परिददतु मासास्त्वृतुभ्यः परिददत्वृतवस्त्वा संवत्सराय परिददतु संवत्सर- स्त्वायुषे जरायै परिददात्वसौ ॥७॥ इन मन्त्रों को पढ़के बालक को आशीर्वाद देवे। पुनः— अङ्गादङ्गात् सꣳस्रवसि हृदयादधिजायसे। प्राणं ते प्राणेन सन्दधामि जीव मे यावदायुषम्॥८॥ अङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे। वेदो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥९॥ अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव। आत्माऽसि पुत्र मा मृथाः स जीव शरदः शतम्॥१०॥ पशूनां त्वा हिङ्कारेणाभिजिघ्राम्यसौ ॥११॥

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