संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० संस्कारविधिः इन मन्त्रों को पढ़के पुत्र के शिर का आघ्राण करे अर्थात् सूंघे। इसी प्रकार जब-जब परदेश से आवे वा जावे, तब- तब भी इस क्रिया को करे, जिससे पुत्र और पिता-माता में अति प्रेम बढ़े। ओम् इडासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनथाः। सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान्वीरवतोऽकरत्॥ इस मन्त्र से ईश्वर की प्रार्थना करके, प्रसूता स्त्री को प्रसन्न करके, पश्चात् स्त्री के दोनों स्तन किञ्चित् उष्ण, सुगन्धित जल से प्रक्षालन कर पोंछके— ओम् इमथँ स्तन॒मूर्ज॑स्वन्तं धया॒पां प्रपी॑नमग्ने स॒रि॒रस्य॒ मध्यें। उत्सं॑ जुषस्व॒ मधु॑मन्तमर्वन्त्समु॒द्रिय॒थँ सद॑न॒मा वि॑शस्व॥ इस मन्त्र को पढ़के दक्षिण स्तन प्रथम बालक के मुख में देवे। इसके पश्चात्— ओं यस्ते॒ स्तन॑: शश॒यो यो म॑यो॒भूर्यो र॑त्न॒धा व॑सु॒विद्यः सु॒दत्र॑:। येन॒ विश्वा॒ पुष्य॑सि॒ वार्या॑णि॒ सर॑स्वति॒ तमि॒ह धात॑वे कः॥ इस मन्त्र को पढ़के वाम स्तन बालक के मुख में देवे। तत्पश्चात्— ओम् आपो देवेषु जाग्रथ यथा देवेषु जाग्रथ। एवमस्याथँ सूतिकायाथँ सपुत्रिकायां जाग्रथ॥ इस मन्त्र से प्रसूता स्त्री के शिर की ओर एक कलश जल से पूर्ण भरके दश रात्रि तक वहीं धर रक्खे तथा प्रसूता स्त्री प्रसूत-स्थान में दश दिन तक रहे। वहाँ नित्य सायं और प्रातःकाल सन्धिवेला में निम्नलिखित दो मन्त्रों से भात और सरसों मिलाके दश दिन तक बराबर आहुतियाँ देवे—